ब्लॉग आर्काइव

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

ज्ञान समन्दर : प्रिया देवांगन "प्रियू"

 



लगा किताबों का मेला है, 
ज्ञान समन्दर जैसा।
देख-देख कर सिर चकराता, 
है अथाह ये ऐसा।।

सबसे प्यारी भाषा लगती,
राजदुलारी हिन्दी।
बात–बात पर मुँह लटकाती,
नहीं लगे जब बिंदी।।

नदी पहाड़ी जंगल घाटी,
सबका नाम बताते।
गोल–गोल भूगोल पढ़ें तो,
चक्कर खा गिर जाते।।

कभी भाग अरु गुणा करें हम,
कभी घटा कर जोड़ें।
अमरबेल सा उलझे दिनभर,
माथा कितना फोड़ें।।

अपनी धाक जमा कर बैठी,
अंग्रेजों की भाषा।
पढ़ ना पाओ कक्षा में तब,
बनता खूब तमाशा।।

कम करवा दो बोझ हमारा,
मुश्किल लगे पढ़ाई।
हम नन्हें बच्चों का जीवन,
हुआ बहुत दुखदाई।।




प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

शरारती चूहा//प्रिया देवांगन "प्रियू"

 



चूहा बिल्ली खेल निराला।
बिल्ली गोरी चूहा काला।।

बिल्ली चूहे को दौड़ाए।
चूहा झट बिल में घुस जाए।।

खूब करे पकड़म–पकड़ाई।
छिप कर चूहा ले अँगड़ाई।।

पर बिल्ली के हाथ न आता।
झाँक–झाँक कर खूब चिढ़ाता।।

चिढ़ जाती खिसियानी बिल्ली।
चूहा रोज उड़ाता खिल्ली।।






प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़






मटर के खेत में मुसीबत" शरद कुमार श्रीवास्तव



 



एक समय की बात है, एक गाँव में चिकन परिवार रहता था — और ये कोई साधारण परिवार नहीं था! पूरे बीस सदस्य! मम्मी चिकन, पापा चिकन, दादी, दादा, नानी, नाना, चाचू, मामी, मौसी, फूफा, और बहुत सारे चूजे — सब मिलाकर पूरे बीस!


एक दिन सबने तय किया कि आज मज़े करने के लिए कहीं बाहर चलना चाहिए। दादी ने कहा, "चलो मटर के खेत में चलते हैं!"

"हाँ! हाँ!" सारे चूजे खुशी से चिल्लाए।


लेकिन यह मटर का खेत था चिंपू चिम्पांज़ी अंकल का, और थोड़ा सा ‘नो एंट्री ज़ोन’ में आता था। मतलब बिना पूछे जाना मना था।


"चलो! थोड़ी देर मटर खाकर ही तो आएँगे," मम्मी चिकन मुस्कुरा कर बोलीं।

सबने धीरे-धीरे, चुपचाप खेत में घुसपैठ की।


वहां मटरें तो जैसे बोल-बोल कर बुला रही थीं — हरे-हरे, मोटे-मोटे दाने।

"पकड़ो-पकड़ो!"

"तोड़ो-तोड़ो!"

"खा लो-खा लो!"


सबने शुरू कर दी मटर पार्टी!

चूजे मटर के दानों को फूटबॉल की तरह लुढ़काने लगे।

दादी ने मटर की माला बना ली।

पापा चिकन ने तो मटर के दाने से ढोल बजाना शुरू कर दिया।


तभी... धड़ाम! धड़धड़धड़!


पीछे से चिंपू चिम्पांज़ी अंकल आ गए — और उनके हाथ में था एक बड़ा चश्मा और एक सीटी!

"अरे ओ मटर चोरों! ये क्या हो रहा है?"

सारे चिकन चौक गए, मटर के दाने हवा में उछल गए।


चिंपू अंकल ने सबको गोल घेरा बनाकर बैठाया और बोले,

"बिना पूछे किसी के खेत में जाना अच्छी बात नहीं। और मटर की तो यह बहुत कीमती वैराइटी  है!"


सबने गर्दन झुका ली, "सॉरी चिंपू अंकल… हमने बिना पूछे मटर खाई।"


अंकल हँसने लगे, "अरे डरने की बात नहीं, लेकिन अगली बार इजाज़त ज़रूर लेना!"


फिर क्या — अगली बार चिकन परिवार ने चिंपू अंकल को खुद दावत पर बुलाया। सबने मिलकर मटर पुलाव, मटर टिक्की, और मटर शेक (!) बनाया।

आखिर 

मटर हो या खेत — बिना पूछे जाना नहीं चाहिए। लेकिन माफ़ी माँगने से दिल भी मिलते हैं और मटर भी! 

शरद कुमार श्रीवास्तव 



आकाश हिरण की उडने की चाह