ब्लॉग आर्काइव

सोमवार, 29 सितंबर 2025

ओवरकोट और बिल्ली का बच्चा: अंजू जैन गुप्ता

 


ओजी के पास एक छोटा सा बिल्ली का बच्चा था जिसे वह प्यार से रोपसी कहकर बुलाता था। ओजी रोज़ स्कूल से आते ही उसके साथ खेलने लग जाता था।एक दिन ओजी स्कूल से आता है और आते ही कहने लगता है," रोपसी - रोपसी चलो जल्दी से मेरे साथ चलो मैं तुम्हें एक मीठी आवाज सुनाता हूँ , देखो हमारे बगीचे में कोयल कितना मीठा गाना गा रही है और उसका गाना सुनने तोता भी आया है। "

तभी रोपसी कहता है, अरे भई !मुझे पहले अखरोट तो खाने दो; देखो तुम्हारी मम्मी ने कितनी मेहनत से ओखली में इन्हें कूट- कूट कर मेरे लिए छोटा किया है ताकि मैं आराम से खा सकू। ओजी कहता है अच्छा एक काम करो तुम थोड़े से एक कटोरी में ले लो वही पर खा लेना। यह बात सुनते ही रोपसी कहता है very good ओजी तुमनें सही आइडिया दिया है। वह झट से अखरोट एक कटोरी में डाल लेता है और ओवरकोट पहनने लगता है; तभी ओजी कहता है अरे भई रोपसी अब तुम गर्मी में ओवरकोट क्यों पहन रहे हो? रोपसी कहता है ओजी ओजी बाहर देखो ओस की बूंदे पड़ी है। बाहर तो सर्दी होगी तुम भी अपना overcoat पहन लो नहीं तो तुम्हें सर्दी लग जाएगी इतना सुनकर ओजी जोरों से हँसने लगता है हा ..हा हा अरे भई गर्मी के मौसम में भी कोई ठंड लगती है!

रोपसी ओजी से गुस्सा हो जाता है कहता है जाओ में तुमसे बात नहीं करता। तुम मेरी बात पर हँसते हो। अब ओजी को लगा कि रोपसी तो उससे नाराज़ हो गया वह जल्दी से माफी माँगता है कहता है नहीं नहीं रोपसी मुझे माफ़ कर दो पर तुमने बात ही ऐसी की थी कि मुझे हँसी आ गई।

अच्छा सुनो बाहर ओस की बूंदे नहीं है वो तो बारिश की बूंदे हैं अभी थोड़ी देर पहले ही बारिश हुई थी उसी की बूंदे हैं।

इतना सुनकर रोपसी ओवरकोट रख देता है और ओढ़नी लेकर आ जाता है। अब बहुत मुश्किल से ओजी अपनी हँसी रोकते हुए पूछता है रोपसी तुम इस ओढ़नी का क्या करोगे, इसे क्यों लाए हो?

यह सुनकर रोपसी कहता है अगर फिर से बारिश हो गई तो हम इसे अपने सिर पर ढक लेगे और बारिश की बूंदे हमारे ऊपर नहीं गिर पायेगी।

ओजी कहता है नहीं नहीं रोपसी ओढ़नी की आवश्यकता नहीं है मैंने अपने साथ छाता ले लिया है।

अब चलो जल्दी से कहीं देर हो गई तो कोयल उड़ ना जाए। रोपसी भी कहता है हाँ हाँ चलो चले।



अंजू जैन गुप्ता


रिक्तता : प्रिया देवांगन "प्रियू"

 







चिड़ियों के कलरव से पहले, नयन सदा खुल जाते थे।
भोर सूर्य के दर्शन पा कर, तन मन शक्ति जगाते थे।।

पुष्पों की जब मंद सुरभि भी, आँगन में मुस्काती थी।
देख आपकी प्रेम प्रभा को, पूर्वा शोर मचाती थी।।

सूर्य तेज सा चमकीला मुख, सात्विक जीवन अपनाते।
दया प्रेम सॅंग मीठी बोली, हँसकर ही करते बातें।।

क्रोध न दिखता क्षण भर उनमें, काया थी निर्मल माटी।
नेक कार्य कर नाम कमाए, छोड़ चले यह परिपाटी।।

लगता जब आनंदित जीवन, क्यों बाधा घिर आती है।
हर्षित होता मन इक क्षण में, दूजा दुःख थमाती है।।

पिता बिना संसार अधूरा, सूना मेरा आँगन है।
आगे बढ़ने का प्रयास है, किंतु सतत विह्वल मन है।।

वही भोर है वही किरण पर, पात–पात हैं मुरझाए।
बिना छुए हम चरण आपके, कैसे आगे बढ़ पाऍं।।




//रचनाकार//
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़







अपना पराया : प्रिया देवांगन "प्रियू"




          "अभी तक खेत से माँ-बाबूजी दोनों नहीं आये हैं। कम से कम माँ को तो आ ही जाना चाहिए था। पता नहीं, इतनी बारिश में वे दोनों कहाँ होंगे।" घर से बार-बार निकल कर सुमन राधे और गौरी की राह ताक रही थी।
          शाम का समय था। घड़ी की सुइयाँ पाँच बजने का इशारा कर रही थी। चूँकि बारिश का मौसम था; सो घटाटोप अंधेरा छाने लगा था। तरह–तरह के कीट–पतंगे व झींगुर की आवाज सुमन के कानों को छू रही थी। सुमन बहुत डरी हुई थी आज। कई तरह की शंकाएँ सुमन को घेरती जा रही थी- "पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ था; पता नहीं आज अचानक क्या हो गया। वे दोनों खेत से जल्दी आ जाया करते थे।"
         सुमन के दिलो-दिमाग में बड़ा विचलन था। उसका किसी कार्य में मन ही नहीं लग रहा था। देखते ही देखते गरजना शुरू हो गया। बिजली भी चमकने लगी। तभी उसे कुछ दिन पहले गाँव में हुई एक घटना याद आने लगी। वह सहम गयी। खेतों में काम कर रही महिलाओं के ऊपर गाज जो गिर गयी थी। सब ने दम तोड़ दिया था। बार–बार वह दृश्य आँखों के सामने झूल रहा था रहा था। अब तो सुमन की मन ही मन बात हो रही थी कि माँ–बाबू जी दोनों से मैंने कहा था कि जल्दी आना। फिर भी वे मेरी बातें नहीं सुनते। 
          जैसे ही सुमन घर अंदर आयी, बिजली चली गयी। जैसे–तैसे उसने मोमबत्ती जलाया। घर में रोशनी हुई। मन थोड़ा शांत लगा। सुमन घबराने लगी थी- "हे प्रभु ! मेरे माँ–बाबू जी जल्दी घर आ जाए। मुझे बहुत घबराहट हो रही है। कहीं... कुछ...!" 
          थोड़ी देर बाद सुमन को राधे की आवाज सुनाई दी- "सुमन ....! अरी ओ सुमन बिटिया ! जरा मोमबत्ती बाहर लाना तो; बहुत अँधेरा है।" सुमन के जान में जान आई। "जी बाबू जी...." कहते हुए बाहर निकली। सुमन की आँखें माँ को ढूँढ रही थी- "बाबू जी, माँ कहाँ है ? आप लोगों ने इतनी देर क्यों लगा दी आने में ? देखो न, बस बारिश होने ही वाली है; जल्दी आना चाहिए था ना। क्या कर रहे थे आप लोग अभी तक ?"
          सुमन का तो आज सवाल पे सवाल हो रहा था। तभी पीछे से माँ की परछाई नजर आयी। सुमन मुँह बनाते हुए बोली- "आप दोनों को तो मेरी बिल्कुल चिंता ही नहीं है।" तभी अचानक अपनी माँ गौरी को देखते ही सुमन की आँखें फटी की फटी रह गयी। उनकी गोद में एक छोटा सा घायल बछड़ा था। 
          सुमन चुपचाप घर के अंदर चली गयी। सुमन का गुस्सा और भी तेज हो गया था। बोलने लगी कि इतनी रात हो गयी; और आप लोग इस बछड़े को लाये। इसकी क्या जरूरत थी। मैं यहाँ परेशान हूँ। तरह–तरह के मन में ख्याल आ रहे हैं और आप लोग, बस !" 
          राधे और गौरी ने सुमन को शांत करते हुए पूरी घटना की जानकारी दी- "यह बछड़ा कुछ देर पहले ही जन्म लिया था और इसकी माँ उसे छोड़ कर कहीं चली गयी थी। बछड़ा हम्मा...हम्मा... कर रहा था। इसकी मदद करने वाला कोई नहीं दिखा। तेज बारिश भी हो रही थी। बेचारा भीग रहा था। हमें लगा कि बछड़ा बेसहारा है। आधी रात को भला कहाँ जायेगा ? यदि कभी कोई तुम्हें मदद माँगे तो क्या तुम छोड़ कर आ जाओगी सुमन ? मदद नहीं करोगी ? अरे ये तो बेचारा बोल नहीं सकता , तो क्या हम इनकी भाषा भी ना समझें। हमें सब की मदद करनी चाहिए सुमन।" गौरी बोलती ही रही- "सुमन, तुम ही बताओ। अभी थोड़ी देर पहले तुम हम दोनों के बगैर कैसे तड़प रही थी ? जबकि तुम्हें तो पता ही है कि हम आयेंगे ही; फिर भी?" अपने माँ और बाबू जी की बातें सुन सुमन ने अपनी ओर देखते उस मासूम बछड़े को गले से लगा लिया। राधे और गौरी सुमन व बछड़े दोनों को सहला रहे थे
                                -----//------




प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
Priyadewangan1997@gmail.com



बदलता परिवेश : प्रिया देवांगन "प्रियू"

 




कितना बदलेंगे अब रंग। दृश्य देख मन रहता दंग।।
सभी स्वार्थ के हैं इंसान। खुद संकट में डालें प्राण।।

काट रहे वन उपवन आज। करते महल बना कर राज।।
धधक रही जंगल में आग। लगा रहे कुदरत में दाग।।

सुबक रहे हैं शीशम साल। कहवा महुआ हैं बेहाल।।
चार चिरौंजी जामुन बेर। जाने कहाँ हुए हैं ढेर।।

बिखर गई चंदन की गंध। बिगड़ा नर-वन का संबंध।।
रेशम कीड़े करें विलाप। वन का नाश बना अभिशाप।।

खिले कहाॅं से उपवन फूल। बची जहाॅं बस मिट्टी धूल।।
धूमिल है इनकी पहचान। कल तक थे कानन की शान।।

नष्ट टहनियाँ पत्ते शाख। अंगारों में जलकर राख।।
भावुकता का घटता मोल। हे! मानव तू आँखें खोल।।

छुरी बगल में मुँह में राम। बेच लकड़ियाँ लेते दाम।।
मानव बिछा रहे हैं जाल। बुला रहे पर अपना काल।।

पुनः करो अब नव निर्माण। रहे सुरक्षित सबके प्राण।।
लें फिर नई कोंपलें श्वास। लाओ जग में नया उजास।।





प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

दादा-दादी एवं नाना-नानी संकलन अर्पणा श्रीवास्तव

 


दादा-दादी एवं नाना-नानी कौन होते हैं? एक छोटी बच्ची ने निबंध लिखा कि,

😘दादा-दादी एवं नाना-नानी 

एक महिला और एक पुरुष होते हैं।

जिनके अपने कोई छोटे बच्चे नहीं होते।

😘वे हमेशा दूसरों के बच्चों को भी पसंद करते हैं।

😘वे बाहर रहते हैं जब वे आते हैं तो हमें उन्हें लेने जाना होता है और बाद में वापस स्टेशन या एयरपोर्ट पर छोड़ने जाना होता है।

😘🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻

😘वे हमेशा बूढ़े लोग होते हैं।

😘 वे बाहर का बना खाना पसंद नहीं करते।

😘जब वे हमें सैर पर ले जाते हैं, तो वे हमेशा धीरे धीरे चलते  हैं।

😘वे हमसे हमेशा महापुरुषों के बारे में बात करते हैं।

😘वे किसी को बुरे शब्द नहीं बोलते।

😘आमतौर पर वे सुबह चाय या कॉफी पीते हैं।

😘वे चश्मा पहनते हैं 

😘वे ब्रश करने के लिए अपने दांत निकाल सकते हैं 😄

😘नानी एवं दादी हमेशा मम्मी से ज़्यादा स्वादिष्ट खाना बनाती हैं।

😘दादा एवं नाना हमें ऐसी कहानियाँ सुनाते हैं जो हैरी पॉटर से भी बेहतर होती हैं।

😘दादा-दादी, नाना नानी मंमी पापा की तरह नहीं लड़ते। 🤭

😘हर किसी को कोशिश करनी चाहिए कि उसके पास दादी-दादा या नाना नानी हों।

😘वे हमारे साथ प्रार्थना करते हैं और हमें प्यार करते हैं।

😘दादाजी एवं नाना जी दुनिया के सबसे समझदार आदमी होते हैं लेकिन  वे भुलकङ होते हैं। वे अपना चश्मा भी रखकर भूल जाते हैं!

 *हो सके तो इसे अन्य दादा-दादी,नाना-नानी को भेजें। यह उनका मन ख़ुश कर देगा।*


संकलन : अर्पणा श्रीवास्तव

 संत कबीर  नगर

🌹❤️🌹

औली और मौली की बागवानी :अंजू जैन गुप्ता

 



 औली और मौली दोनों सहेलियाँ थीं और एक ही कक्षा में पढ़ती थीं। वे दोनों चौथी कक्षा में पढ़ती थीं। औली को पौधें लगाने का बहुत शौक था वह अपनी मम्मी की पौधों की देखरेख करने में भी मदद करती थी। वह मम्मी को मिट्टी खोदने के

औज़ार भी पकड़ा देती थी।

किंतु मौली इसके बिल्कुल विपरीत थी उसे बिल्कुल भी शौक नहीं था वह पौधों का ध्यान भी नहीं रखती थी। औली के बगीचे में लौकी और पालक लगी हुई थी। वह सारी सब्जियाँ खुश होकर खाती थी।एक दिन औली स्कूल में पालक की सब्जी और लौकी का हलवा लेकर जाती हैं वह मौली को कहती है, मौली तुम भी आज पालक की सब्जी और लौकी का हलवा खाकर देखो कितना स्वादिष्ट है । परंतु मौली कहती है नहीं नहीं, मुझे नहीं खानी ये सब्जियाँ मैं तो अपना सैंडविच ही खाऊँगी तुम ही खाओ ये सब्जियाँ बेकार सी। औली मौली की बात सुनकर उसे समझाती है और कहती है मौली ये सब्जियाँ बेकार नहीं होती है इनमें बहुत ताकत होती है ये तो हमें बीमारियों से बचाती है। लौकी में आयरन , फाइबर ,विटामिन सी और मैग्नीशियम होता है जो हमें दिल कि बीमारियों से और कब्ज से बचाती है। मौली मौन होकर औली की बात सुन रही थी। फिर औली कहती हैं कि पालक में भी आयरन सबसे ज्यादा होता है। जो हमे खून की कमी (एनीमिया की बीमारी) से बचाती है इसमें विटामिन ए ,मैग्नीशियम आदि होते हैं। ये दोनों ही हमारी immunity को बढ़ाती है और हमे बीमार होने से रोकती हैं। इतना सुनते ही मौली कहती है जो भी हो मेरा तो सैंडविच ही अच्छा है। दोनों अपना अपना खाना खा लेती हैं। दो दिन हो जाते है मौली स्कूल नहीं आती अब औली परेशान हो जाती है यह सोचकर कि मौली स्कूल क्यों नहीं आ रही है। औली स्कूल से दौड़ी दौड़ी घर पहुँचती है और अपनी मम्मी को आवाज़ लगाती है मम्मी मम्मी आप कहाँ हो? जल्दी से आओ ना और मुझे मौली के घर ले चलो उससे मिलना है मौली दो दिन से स्कूल नहीं आ रही है, पता नहीं उसे क्या हुआ? कही उसकी तबीयत तो खराब नहीं हो गयी है! औली की मम्मी फोन पर किसी औरत से बात कर कर रही थी वह औली की बात सुनकर जल्दी से फोन बंद कर देती है और औली के साथ मौली के घर चली जाती हैं। मौली के घर जाकर देखते हैं वहाँ मौली बिस्तर पर लेटी हुई औषधि खा रही होती है। औली मौली को बीमार देखती है तो उसे अच्छा नहीं लगता वह कहती है देखा मौली तुम सब्जियाँ नहीं खाती हो इसलिए तुम्हारी immunity भी बहुत कम है तुम बार बार बीमार हो जाती हो।

औली की बात सुनकर मौली रोने लगती है और कहती है हाँ हाँ औली तुम सही कह रही हो हमे सब्जियाँ खानी चाहिए। देखो ना डॉक्टर ने मुझे चॉकलेट, आइसक्रीम , पिज्जा और candies सब खाने के लिए मना किया है और ये कड़वी दवाइयाँ खाने के लिए दी है। डॉक्टर अंकल ने भी यही कहा है कि मेरी immunity बहुत कम है इसलिए मैं बार - बार बीमार हो जाती हूँ। इतना कहकर वह फिर से रोने लगती है।

औली उसे कहती है मौली कोई बात नही तुम लौकी,पालक और बाकी भी

सारी सब्जियाँ खाना शुरू कर दो तुम देखना फिर तुम जल्दी से ठीक हो जाओगी। और फिर हम पिज्जा और आइसक्रीम पार्टी भी करेगें। मौली तभी अपनी मम्मी से कहती है मम्मी मम्मी जल्दी से मेरे लिए सब्जियों का सूप ले आओ मैं पी लूँगी। मौली जल्दी से सारा सूप पी लेती है।

मौली की मम्मी कहती है अच्छा हुआ औली तुम घर गई

मौली कहती है हाँ हाँ औली मम्मी ठीक कह रही हैं देखो तुम्हारे आने से मैं सब्जियाँ भी खाने लगी हूँ। अब मैं जल्दी से ठीक होने जाओगी।

कुछ देर बाद औली की मम्मी मौली से कहती है मौली तुम अपना ध्यान रखना अब हम घर चलते हैं फिर मिलेंगे। मौली भी अपना सिर हिला कर कहती हैं ok आंटी bye bye। और मौली औली को भी bye करती है।



अंजू जैन गुप्ता


अं होली के रंग: अंजू जैन गुप्ता

 


इस बार चंपू मार्च में अपनी परीक्षा समाप्त होने के बाद नाना- नानी के संग अंटार्कटिका घूमने जाता है। जैसे ही वे सभी अंटार्कटिका पहुँचते है चंपू जोरों से चिल्लाने लगता है नानू- नानी यहाँ पर तो कितनी ठंड है और चारों ओर बर्फ ही बर्फ है। देखो कितने सुंदर – सुंदर पेंग्विन है। चंपू की बाते सुनकर एक पेंग्विन दौड़ता हुआ उनके पास आता है और कहता है अंकल आंटी नमस्ते मेरा नाम चंकू है और मैं यही अपने परिवार के संग रहता हूं। आप सब मेरे संग चलो मैं आपको अपना घर दिखाता हूँ तभी चंपू के नाना जी कहते हैं नहीं बेटा हम बाद में आयेगें। अभी हम चलते हैं। इतना कहकर वे होटल चले जाते हैं। जैसे ही चंपू होटल के कमरे में पहुँचता है कहने लगता है नानी- नानी यहाँ तो पंखा ही नहीं है नानू कहते हैं कोई नहीं चंपू बेटा dekho यहाँ पर कितनी ठंड है फिर पंखे की तो जरूरत ही नहीं है। चंपू नानू की बात सुनकर कहता है हाँ जी नानू आप सही कह रहे हो यहाँ तो बहुत ठंड है बिना पंखे के ही इतनी ठंड लग रही है नानू पंखा चलाएंगे तो हम जम ही जायेगे। नानी कहती हैं चलो अब खाना खाकर सब सो जाते हैं कल सुबह जल्दी भी उठना है। चंपू कहता है, हाँ -हाँ नानी कल तो होली है। मैं भी जल्दी से सो जाता हूँ,मुझे कल चंकू के संग रंगों से होली खेलने भी जाना है। इतना कहकर सब सो जाते हैं।

सुबह उठते ही चंपू जल्दी से होली के कपड़े पहनकर तैयार हो जाता है और नानू नानी से कहता है नानू चलो न चंकू के घर मुझे उसके साथ रंगों से होली खेलनी है। नानू कहते हैं चंपू पेंग्विन रंगों से नहीं खेल सकते क्योंकि रंग उनके फेदर और स्किन को खराब कर सकता है और उनके लिए हानिकारक होता है। चंपू यह सुनते ही उदास हो जाता me और रोने लगता है और रोते रोते कहता है मुझे chanku के साथ खेलना है। उसके रोने की आवाज सुनकर नानी आती हैं और कहती है चंपू बेटा चुप हो जाओ जल्दी से अंगना में अंगूर रखे हैं वे ले आओ और हमारी उंगली पकड़ कर चलो हम रंग से नहीं पानी से होली खेल लेगे और साथ ही तुम्हारे मित्र को उपहार में अंगूर भी दे देंगे चंपू नानी की यह बात सुनकर खुशी से उछलने लगता है ये और वे सभी पेंग्विन के घर होली मनाने के लिये चले जाते हैं।



अंजू जैन गुप्ता


शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

राष्ट्रीय आम दिवस: अंजू जैन गुप्ता



 




 





आजादी की चाहत :स्वतंत्रता दिवस विशेष : बालकथा : रचना प्रिया देवांगन "प्रियू"

स्वतन्त्रता दिवस पर प्रिया देवांगन  प्रियू की रचना पुन: प्रकाशित  की जा रही है



 



           एक जंगल था बागबाहरा। हर पशु-पक्षी का अपना अलग समुदाय था। सब खुश थे। हाथियों का भी एक दल था। दल का नेतृत्व चंदा नाम की हथिनी करती थी। उस दल में एक हिरणी भी थी। नाम था किटी। उसे हाथियों के साथ रहने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी। उसकी विवशता थी कि उसके माता-पिता ने प्राण त्यागते समय उसे हाथी-दल को सौंप दिया था। शुरुआत में हाथियों का व्यवहार किटी के प्रति अच्छा था, पर समय के साथ उनके व्यवहार में परिवर्तन आने लगा। अब वे किटी के साथ गुलाम सा व्यवहार किया करते थे। किटी उनसे तंग आ चुकी थी। उसकी एक ही चाहत थी हाथियों से आजादी।

             किटी हमेशा सोचती रहती थी कि उसे आजादी कैसे और कब मिलेगी। अपने माता-पिता को याद कर के बहुत रोती थी। उसे इसलिए भी अच्छा नहीं लगता था क्योंकि यह सिर्फ हाथियों का समुदाय था। उन सब मे किटी अकेली महसूस करती थी। उनकी बातें भी किटी को नहीं समझ नहीं आती थी। चंदा हथिनी का एक बेटा था- मौजी। दल का अकेला वारिस था। मौजी और किटी में अच्छी मित्रता थी। दोनों साथ में खेलते कूदते थे। लेकिन चंदा को इन दोनों की दोस्ती बिल्कुल भी पसन्द नहीं थी । चंदा को किटी से काम करवाने में बस ज्यादा दिलचस्पी थी। उसे मौजी से दूर रखने का पूरा प्रयास करती थी।

          कुछ दिन बाद पन्द्रह अगस्त आने वाला था। जंगल के सभी जानवर पन्द्रह अगस्त मनाने की तैयारी में लग गए। हाथी समुदाय ने इस वर्ष बड़े धूमधाम से स्वतंत्रता दिवस मनाने का फैसला किया था। जंगल के सभी पशु-पक्षियों को भी आमंत्रित करने का निर्णय लिया गया। जंगल को दुल्हन की तरह सजाया गया। फल-फूल , मिठाई , बूंदी, नये-नये पकवानों की महक जंगल में फैलने लगी थी। कार्यक्रम में खेल-प्रतियोगिता, गीत-कहानी , भाषण शामिल थे। मौजी और किटी बहुत खुश थे। मौजी और किटी चंदा हथिनी से पूछ ही डाले- "यह सब हम क्यों कर रहें हैं ? जंगल को क्यों इस तरह सजाया जा रहा है ?" चंदा हथिनी मुस्कुराते हुए बोली- "पन्द्रह अगस्त सन् उन्नीस सौ सैंतालीस को हम अंग्रेजों के गुलामी से आजाद हुए थे। इसलिए हम हर साल इसे स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं; और तिरंगा भी फहराते हैं इस दिन।" तभी किटी खुशी से उछल पड़ी और बोली कि क्या मुझे भी यहाँ से आजाद कर दिया जाएगा। क्या मैं भी अपनी जाति-समुदाय में जा सकती हूँ।" चंदा किटी को घूरती हुई बोली- "बिल्कुल नहीं। तुम्हारे मम्मी-पापा ने तुम्हारी जिम्मेदारी हमें दी है। चिंता मत करो, तुम यहाँ से कहीं नहीं जाओगी।"

            किटी की आँखों से आँसू बहने लगे। मौजी ने चंदा हथिनी से धीमे स्वर में कहा- "माँ ! हम किटी को आजाद क्यों नहीं कर सकते हैं  ? उसे हिरण-समुदाय से अलग क्यों रखा गया है ? अभी आपने ही बताया कि स्वतंत्रता का मतलब आजादी होती है, फिर किटी को क्यों नहीं मिल सकती आजादी।" चंदा हथिनी बिना कुछ बोले वहाँ से चली गयी। उसके पीछे-पीछे मौजी भी जाने लगा। बार-बार मौजी चंदा को एक ही प्रश्न करने लगा। चंदा परेशान हो गयी। आखिर चंदा हथिनी सोचने लगी। फिर मौजी ने किटी को कहा- "तुम चिंता मत करो किटी। मैं तुम्हे आजादी दिलाऊँगा। देखना, स्वतंत्रता दिवस हम सब के लिए यादगार होगा।"

            15 अगस्त आया। जंगल में सुबह सात बजे चंदा हथिनी के द्वारा ध्वजारोहण होना था। चिड़ियों की चहक गूँजने लगी। सभी शाकाहारी जानवर- नीलगाय, चीतल, बारहसिंगा, खरगोश और हिरण समुदाय भी शामिल हुए। किटी हिरणियों को देख कर उछल पड़ी। जैसे ही उनसे मिलने जाने वाली थी कि चंदा हथिनी ने उसको रोक लिया। किटी सहम गयी। वहीं मौजी खड़ा देखता रहा। चंदा हथिनी ने ध्वजारोहण किया। राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत हुआ। फिर कविता पाठ शुरू किया गया। किटी और मौजी भी कविता पाठ में शामिल थे। सबने बारी-बारी से कविता, गीत, भाषण दिया। मौजी ने अपने भाषण में चंदा हथिनी की ओर इशारा करते हुए कहा- "देश तो आजाद हो गया है, फिर भी न जाने कितने लोग अभी भी गुलामी में जीवन यापन कर रहे हैं। कुछ लोग दूसरों को नौकर बनाकर रखा है। कहीं तो पूरे परिवार पर अपना हक जमा बैठे हैं। बच्चों को भी नहीं छोड़ा जा रहा है। दूसरे बच्चों का लालन-पालन की जिम्मेदारी लेकर उनका शोषण कर रहे हैं।" सब समझ रहे थे कि किटी हिरणी और चंदा हथनी की बात हो रही है। मौजी ने अपनी बात जारी रखी- "एक बच्ची को उसके परिवार से दूर रख कर किसी को क्या मिलेगा भगवान जाने। उस बच्ची की बद्दुआ जो कभी आगे बढ़ने नहीं देगी। माँ, आज आप किटी को आजाद कर दीजिए। याद है, आपने कहा था कि बेटा तुम्हे इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप मुझे तोहफा देंगी।। आज मैं सब के सामने आप से यही माँगता हूँ कि इस नन्ही-सी जान किटी को छोड़ दीजिए। इससे बड़ा तोहफा मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता। सभी के आँखों से आँसू बहने लगे। सबको लगने लगा कि छोटा सा बच्चा भरी सभा में बहुत अच्छी बातें बोल रहा है। माँ, आप बताइए कि अगर मुझे आप से दूर कर दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा। क्या आप जिंदा रह पाएँगी मेरे बिना। आज किटी के माता-पिता नहीं है तो आप उसके साथ ऐसा क्यों कर रही हैं।" अपने बेटे मौजी की बातों से चंदा का दिल पिघल गया। उसने किटी हिरणी को आजाद कर दी। सब ने मौजी की जी खोलकर तारीफ की। इतना छोटा सा बच्चा इतना बड़ा काम कर दिया। इस तरह किटी हिरणी को हाथियों से आजादी मिली, जिसकी उसे चाहत थी। 

                 



रचनाकार
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com