ब्लॉग आर्काइव

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

गीजा के पिरामिड


 गीजा के पिरामिड 








भारत की तरह ही मिस्र की सभ्यता भी बहुत पुरानी है और प्राचीन सभ्यता के अवशेष वहाँ की गौरव गाथा कहते हैं। यों तो मिस्र में १३८ पिरामिड हैं और काहिरा के उपनगर गीजा   मे  सामान्य विश्वास के विपरीत सिर्फ गीजा का ‘ग्रेट पिरामिड’ ही प्राचीन विश्व के सात अजूबों की सूची में है। दुनिया के सात प्राचीन आश्चर्यों में शेष यही एकमात्र ऐसा स्मारक है जिसे काल प्रवाह भी खत्म नहीं कर सका।

यह पिरामिड ४५० फुट ऊंचा है। ४३ सदियों तक यह दुनिया की सबसे ऊंची संरचना रहा। 19 वीं सदी में ही इसकी ऊंचाई का कीर्तिमान टूटा। इसका आधार १३ एकड़ में फैला है जो करीब १६ फुटबॉल मैदानों जितना है। यह २५ लाख चूनापत्थरों के खंडों से निर्मित है जिनमें से हर एक का वजन २ से ३० टनों के बीच है। ग्रेट पिरामिड को इतनी परिशुद्धता से बनाया गया है कि वर्तमान तकनीक ऐसी कृति को दोहरा नहीं सकती। कुछ साल पहले तक (लेसर किरणों से माप-जोख का उपकरण ईजाद होने तक) वैज्ञानिक इसकी सूक्ष्म सममिति (सिमट्रीज) का पता नहीं लगा पाये थे, प्रतिरूप बनाने की तो बात ही दूर! प्रमाण बताते हैं कि इसका निर्माण करीब २५६० वर्ष ईसा पूर्व मिस्र के शासक खुफु के चौथे वंश द्वारा अपनी कब्र के तौर पर कराया गया था। इसे बनाने में करीब २३ साल लगे।

म्रिस के इस महान पिरामिड को लेकर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं कि बिना मशीनों के, बिना आधुनिक औजारों के मिस्रवासियों ने कैसे विशाल पाषाणखंडों को ४५० फीट ऊंचे पहुंचाया और इस बृहत परियोजना को महज २३ वर्षों में पूरा किया? पिरामिड मर्मज्ञ इवान हैडिंगटन ने गणना कर हिसाब लगाया कि यदि ऐसा हुआ तो इसके लिए दर्जनों श्रमिकों को साल के ३६५ दिनों में हर दिन १० घंटे के काम के दौरान हर दूसरे मिनट में एक प्रस्तर खंड को रखना होगा। क्या ऐसा संभव था? विशाल श्रमशक्ति के अलावा क्या प्राचीन मिस्रवासियों को सूक्ष्म गणितीय और खगोलीय ज्ञान रहा होगा? विशेषज्ञों के मुताबिक पिरामिड के बाहर पाषाण खंडों को इतनी कुशलता से तराशा और फिट किया गया है कि जोड़ों में एक ब्लेड भी नहीं घुसायी जा सकती। मिस्र के पिरामिडों के निर्माण में कई खगोलीय आधार भी पाये गये हैं, जैसे कि तीनों पिरामिड आ॓रियन राशि के तीन तारों की सीध में हैं। वर्षों से वैज्ञानिक इन पिरामिडों का रहस्य जानने के प्रयत्नों में लगे हैं किंतु अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है।

मिस्र के डंडेरा  नाम की जगह पर एक प्राचीन मंदिर है जिसे मिस्र वासियो ने अपने एक भगवान् हैथोर के लिए बनाया था।  इस मंदिर की दीवार पे एक चित्र बना हुआ है जो प्राचीन मिस्र में बिजली की उपस्थिति होने का संकेत देता है ,, इसे डंडेरा लाइट , कहाँ जाता है।   और उस मंदिर को डंडेरा लाइट कॉम्प्लेक्स के नाम से आज भी जाना जाता है


शरद कुमार श्रीवास्तव 

(विकिपीडिया से साभार)

 शुतुरमुर्ग


और बकरी की दोस्ती


(बाल कथा)


एक बड़े से वन्य उद्यान में एक लंबा-सा शुतुरमुर्ग और एक चंचल बकरी रहते थे। दोनों का स्वभाव अलग था, लेकिन वे बहुत अच्छे मित्र थे। शुतुरमुर्ग तेज़ दौड़ता था और बकरी ऊँची-ऊँची चट्टानों पर आसानी से चढ़ जाती थी।


एक दिन दोनों भोजन की तलाश में निकले। रास्ते में उन्हें एक छोटा मेमना गहरे गड्ढे में फँसा हुआ दिखाई दिया। वह डर के मारे ज़ोर-ज़ोर से मिमिया रहा था।


बकरी तुरंत चट्टान से उतरकर गड्ढे के पास पहुँची, लेकिन अकेले मेमने को बाहर नहीं निकाल सकी। उसने अपने मित्र शुतुरमुर्ग को आवाज़ दी।


शुतुरमुर्ग तेज़ी से दौड़कर आया। उसने अपनी लंबी गर्दन नीचे झुकाई। मेमने ने उसकी गर्दन को सावधानी से पकड़ लिया। बकरी ने पीछे से सहारा दिया। दोनों ने मिलकर मेमने को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।


मेमना खुशी से उछलने लगा और बोला, "आप दोनों ने मेरी जान बचा ली।"


शुतुरमुर्ग मुस्कुराया और बोला, "जब मित्र मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी कठिन काम आसान हो जाता है।"


बकरी ने कहा, "हर किसी में कोई न कोई विशेष गुण होता है। हमें अपने गुणों का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए।"


उस दिन से वन्य उद्यान के सभी जानवर उनकी दोस्ती और सहयोग की प्रशंसा करने लगे।


शिक्षा: मिल-जुलकर किया गया कार्य कठिन से कठिन समस्या का भी सरल समाधान बन जाता है।




डॉक्टर मंजू यादव

मेरा गाँव बरगद की छा॔व

 कितना प्यारा लगता गाँव।

बैठे सभी बरगद की छाव


चहुंओर छाई हरियाली।।

वन,उपवन को सीचे माली।।

 

मिल,जुल खेले खेल निराले।।

टोली बना चलें मतवाले।।



बहती हवा सुगन्धित सर,सर।।

पत्ते सारे करते फर, फर।।


सावन में झूले पड़ जाते।।

मेघ,मल्हार सभी मिल गा ते।।


बच्चे मिलकर पैग बढ़ाते।।

पैर बड़ा डाली छू आते।।


आती जब होली मस्तानी।।

रंग लगा करते मनमानी।।


दिवाली पर दीप जलाते।।

मिल जुल खील बताशे खाते।।


ऐसा है कुछ गाँव हमारा।।

लगता हमको सबसे प्यारा।।




मंजू यादव एटा

शनिवार, 8 अगस्त 2026

खाकर चूहे बिल्ली बोली। नहीं हमारा पेट भरा।


 

खाकर चूहे बिल्ली बोली।

नहीं हमारा पेट भरा।

जाकर खोजू चुन्नू के घर,

 खाने का सामान जरा।।


म्याऊ, म्याऊ करती फिरती।

उछले  कूदे, कभी न गिरती।


छेड़ो जरा तो आंख दिखाती।

गुस्से में थोड़ा गुर्राती।


शेर की मौसी कहलाती।

दूध मलाई चट कर जाती।।




मंजू यादव 

हरे, भरे होते हैं पेड़।

 









नव जीवन देते हैं पेड़।।

आस पास यदि पेड़ हमारे।।

तो हम जीवित रहेगें सारे।।

रंग बिरंगे फूल हैं पाते।।

देते फल जो,

हम हैं खाते।।

पेड़ों से मिलती हरियाली।।

पंछी बैठे डाली ,  डाली।।


पेड़ों से अस्तित्व हमारा।।

यदि  पेड़ नहीं, तो सूना जग सारा।।

मंजू यादवहरे, भरे होते हैं पेड़।

नव जीवन देते हैं पेड़।।

आस पास यदि पेड़ हमारे।।

तो हम जीवित रहेगें सारे।।

रंग बिरंगे फूल हैं पाते।।

देते फल जो,

हम हैं खाते।।

पेड़ों से मिलती हरियाली।।

पंछी बैठे डाली , डाली।।


पेड़ों से अस्तित्व हमारा।।

यदि पेड़ नहीं, तो सूना जग सारा।।


मंजू यादव

सोमवार, 29 सितंबर 2025

ओवरकोट और बिल्ली का बच्चा: अंजू जैन गुप्ता

 


ओजी के पास एक छोटा सा बिल्ली का बच्चा था जिसे वह प्यार से रोपसी कहकर बुलाता था। ओजी रोज़ स्कूल से आते ही उसके साथ खेलने लग जाता था।एक दिन ओजी स्कूल से आता है और आते ही कहने लगता है," रोपसी - रोपसी चलो जल्दी से मेरे साथ चलो मैं तुम्हें एक मीठी आवाज सुनाता हूँ , देखो हमारे बगीचे में कोयल कितना मीठा गाना गा रही है और उसका गाना सुनने तोता भी आया है। "

तभी रोपसी कहता है, अरे भई !मुझे पहले अखरोट तो खाने दो; देखो तुम्हारी मम्मी ने कितनी मेहनत से ओखली में इन्हें कूट- कूट कर मेरे लिए छोटा किया है ताकि मैं आराम से खा सकू। ओजी कहता है अच्छा एक काम करो तुम थोड़े से एक कटोरी में ले लो वही पर खा लेना। यह बात सुनते ही रोपसी कहता है very good ओजी तुमनें सही आइडिया दिया है। वह झट से अखरोट एक कटोरी में डाल लेता है और ओवरकोट पहनने लगता है; तभी ओजी कहता है अरे भई रोपसी अब तुम गर्मी में ओवरकोट क्यों पहन रहे हो? रोपसी कहता है ओजी ओजी बाहर देखो ओस की बूंदे पड़ी है। बाहर तो सर्दी होगी तुम भी अपना overcoat पहन लो नहीं तो तुम्हें सर्दी लग जाएगी इतना सुनकर ओजी जोरों से हँसने लगता है हा ..हा हा अरे भई गर्मी के मौसम में भी कोई ठंड लगती है!

रोपसी ओजी से गुस्सा हो जाता है कहता है जाओ में तुमसे बात नहीं करता। तुम मेरी बात पर हँसते हो। अब ओजी को लगा कि रोपसी तो उससे नाराज़ हो गया वह जल्दी से माफी माँगता है कहता है नहीं नहीं रोपसी मुझे माफ़ कर दो पर तुमने बात ही ऐसी की थी कि मुझे हँसी आ गई।

अच्छा सुनो बाहर ओस की बूंदे नहीं है वो तो बारिश की बूंदे हैं अभी थोड़ी देर पहले ही बारिश हुई थी उसी की बूंदे हैं।

इतना सुनकर रोपसी ओवरकोट रख देता है और ओढ़नी लेकर आ जाता है। अब बहुत मुश्किल से ओजी अपनी हँसी रोकते हुए पूछता है रोपसी तुम इस ओढ़नी का क्या करोगे, इसे क्यों लाए हो?

यह सुनकर रोपसी कहता है अगर फिर से बारिश हो गई तो हम इसे अपने सिर पर ढक लेगे और बारिश की बूंदे हमारे ऊपर नहीं गिर पायेगी।

ओजी कहता है नहीं नहीं रोपसी ओढ़नी की आवश्यकता नहीं है मैंने अपने साथ छाता ले लिया है।

अब चलो जल्दी से कहीं देर हो गई तो कोयल उड़ ना जाए। रोपसी भी कहता है हाँ हाँ चलो चले।



अंजू जैन गुप्ता


रिक्तता : प्रिया देवांगन "प्रियू"

 







चिड़ियों के कलरव से पहले, नयन सदा खुल जाते थे।
भोर सूर्य के दर्शन पा कर, तन मन शक्ति जगाते थे।।

पुष्पों की जब मंद सुरभि भी, आँगन में मुस्काती थी।
देख आपकी प्रेम प्रभा को, पूर्वा शोर मचाती थी।।

सूर्य तेज सा चमकीला मुख, सात्विक जीवन अपनाते।
दया प्रेम सॅंग मीठी बोली, हँसकर ही करते बातें।।

क्रोध न दिखता क्षण भर उनमें, काया थी निर्मल माटी।
नेक कार्य कर नाम कमाए, छोड़ चले यह परिपाटी।।

लगता जब आनंदित जीवन, क्यों बाधा घिर आती है।
हर्षित होता मन इक क्षण में, दूजा दुःख थमाती है।।

पिता बिना संसार अधूरा, सूना मेरा आँगन है।
आगे बढ़ने का प्रयास है, किंतु सतत विह्वल मन है।।

वही भोर है वही किरण पर, पात–पात हैं मुरझाए।
बिना छुए हम चरण आपके, कैसे आगे बढ़ पाऍं।।




//रचनाकार//
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़







अपना पराया : प्रिया देवांगन "प्रियू"




          "अभी तक खेत से माँ-बाबूजी दोनों नहीं आये हैं। कम से कम माँ को तो आ ही जाना चाहिए था। पता नहीं, इतनी बारिश में वे दोनों कहाँ होंगे।" घर से बार-बार निकल कर सुमन राधे और गौरी की राह ताक रही थी।
          शाम का समय था। घड़ी की सुइयाँ पाँच बजने का इशारा कर रही थी। चूँकि बारिश का मौसम था; सो घटाटोप अंधेरा छाने लगा था। तरह–तरह के कीट–पतंगे व झींगुर की आवाज सुमन के कानों को छू रही थी। सुमन बहुत डरी हुई थी आज। कई तरह की शंकाएँ सुमन को घेरती जा रही थी- "पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ था; पता नहीं आज अचानक क्या हो गया। वे दोनों खेत से जल्दी आ जाया करते थे।"
         सुमन के दिलो-दिमाग में बड़ा विचलन था। उसका किसी कार्य में मन ही नहीं लग रहा था। देखते ही देखते गरजना शुरू हो गया। बिजली भी चमकने लगी। तभी उसे कुछ दिन पहले गाँव में हुई एक घटना याद आने लगी। वह सहम गयी। खेतों में काम कर रही महिलाओं के ऊपर गाज जो गिर गयी थी। सब ने दम तोड़ दिया था। बार–बार वह दृश्य आँखों के सामने झूल रहा था रहा था। अब तो सुमन की मन ही मन बात हो रही थी कि माँ–बाबू जी दोनों से मैंने कहा था कि जल्दी आना। फिर भी वे मेरी बातें नहीं सुनते। 
          जैसे ही सुमन घर अंदर आयी, बिजली चली गयी। जैसे–तैसे उसने मोमबत्ती जलाया। घर में रोशनी हुई। मन थोड़ा शांत लगा। सुमन घबराने लगी थी- "हे प्रभु ! मेरे माँ–बाबू जी जल्दी घर आ जाए। मुझे बहुत घबराहट हो रही है। कहीं... कुछ...!" 
          थोड़ी देर बाद सुमन को राधे की आवाज सुनाई दी- "सुमन ....! अरी ओ सुमन बिटिया ! जरा मोमबत्ती बाहर लाना तो; बहुत अँधेरा है।" सुमन के जान में जान आई। "जी बाबू जी...." कहते हुए बाहर निकली। सुमन की आँखें माँ को ढूँढ रही थी- "बाबू जी, माँ कहाँ है ? आप लोगों ने इतनी देर क्यों लगा दी आने में ? देखो न, बस बारिश होने ही वाली है; जल्दी आना चाहिए था ना। क्या कर रहे थे आप लोग अभी तक ?"
          सुमन का तो आज सवाल पे सवाल हो रहा था। तभी पीछे से माँ की परछाई नजर आयी। सुमन मुँह बनाते हुए बोली- "आप दोनों को तो मेरी बिल्कुल चिंता ही नहीं है।" तभी अचानक अपनी माँ गौरी को देखते ही सुमन की आँखें फटी की फटी रह गयी। उनकी गोद में एक छोटा सा घायल बछड़ा था। 
          सुमन चुपचाप घर के अंदर चली गयी। सुमन का गुस्सा और भी तेज हो गया था। बोलने लगी कि इतनी रात हो गयी; और आप लोग इस बछड़े को लाये। इसकी क्या जरूरत थी। मैं यहाँ परेशान हूँ। तरह–तरह के मन में ख्याल आ रहे हैं और आप लोग, बस !" 
          राधे और गौरी ने सुमन को शांत करते हुए पूरी घटना की जानकारी दी- "यह बछड़ा कुछ देर पहले ही जन्म लिया था और इसकी माँ उसे छोड़ कर कहीं चली गयी थी। बछड़ा हम्मा...हम्मा... कर रहा था। इसकी मदद करने वाला कोई नहीं दिखा। तेज बारिश भी हो रही थी। बेचारा भीग रहा था। हमें लगा कि बछड़ा बेसहारा है। आधी रात को भला कहाँ जायेगा ? यदि कभी कोई तुम्हें मदद माँगे तो क्या तुम छोड़ कर आ जाओगी सुमन ? मदद नहीं करोगी ? अरे ये तो बेचारा बोल नहीं सकता , तो क्या हम इनकी भाषा भी ना समझें। हमें सब की मदद करनी चाहिए सुमन।" गौरी बोलती ही रही- "सुमन, तुम ही बताओ। अभी थोड़ी देर पहले तुम हम दोनों के बगैर कैसे तड़प रही थी ? जबकि तुम्हें तो पता ही है कि हम आयेंगे ही; फिर भी?" अपने माँ और बाबू जी की बातें सुन सुमन ने अपनी ओर देखते उस मासूम बछड़े को गले से लगा लिया। राधे और गौरी सुमन व बछड़े दोनों को सहला रहे थे
                                -----//------




प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
Priyadewangan1997@gmail.com



बदलता परिवेश : प्रिया देवांगन "प्रियू"

 




कितना बदलेंगे अब रंग। दृश्य देख मन रहता दंग।।
सभी स्वार्थ के हैं इंसान। खुद संकट में डालें प्राण।।

काट रहे वन उपवन आज। करते महल बना कर राज।।
धधक रही जंगल में आग। लगा रहे कुदरत में दाग।।

सुबक रहे हैं शीशम साल। कहवा महुआ हैं बेहाल।।
चार चिरौंजी जामुन बेर। जाने कहाँ हुए हैं ढेर।।

बिखर गई चंदन की गंध। बिगड़ा नर-वन का संबंध।।
रेशम कीड़े करें विलाप। वन का नाश बना अभिशाप।।

खिले कहाॅं से उपवन फूल। बची जहाॅं बस मिट्टी धूल।।
धूमिल है इनकी पहचान। कल तक थे कानन की शान।।

नष्ट टहनियाँ पत्ते शाख। अंगारों में जलकर राख।।
भावुकता का घटता मोल। हे! मानव तू आँखें खोल।।

छुरी बगल में मुँह में राम। बेच लकड़ियाँ लेते दाम।।
मानव बिछा रहे हैं जाल। बुला रहे पर अपना काल।।

पुनः करो अब नव निर्माण। रहे सुरक्षित सबके प्राण।।
लें फिर नई कोंपलें श्वास। लाओ जग में नया उजास।।





प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

दादा-दादी एवं नाना-नानी संकलन अर्पणा श्रीवास्तव

 


दादा-दादी एवं नाना-नानी कौन होते हैं? एक छोटी बच्ची ने निबंध लिखा कि,

😘दादा-दादी एवं नाना-नानी 

एक महिला और एक पुरुष होते हैं।

जिनके अपने कोई छोटे बच्चे नहीं होते।

😘वे हमेशा दूसरों के बच्चों को भी पसंद करते हैं।

😘वे बाहर रहते हैं जब वे आते हैं तो हमें उन्हें लेने जाना होता है और बाद में वापस स्टेशन या एयरपोर्ट पर छोड़ने जाना होता है।

😘🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻🫶🏻

😘वे हमेशा बूढ़े लोग होते हैं।

😘 वे बाहर का बना खाना पसंद नहीं करते।

😘जब वे हमें सैर पर ले जाते हैं, तो वे हमेशा धीरे धीरे चलते  हैं।

😘वे हमसे हमेशा महापुरुषों के बारे में बात करते हैं।

😘वे किसी को बुरे शब्द नहीं बोलते।

😘आमतौर पर वे सुबह चाय या कॉफी पीते हैं।

😘वे चश्मा पहनते हैं 

😘वे ब्रश करने के लिए अपने दांत निकाल सकते हैं 😄

😘नानी एवं दादी हमेशा मम्मी से ज़्यादा स्वादिष्ट खाना बनाती हैं।

😘दादा एवं नाना हमें ऐसी कहानियाँ सुनाते हैं जो हैरी पॉटर से भी बेहतर होती हैं।

😘दादा-दादी, नाना नानी मंमी पापा की तरह नहीं लड़ते। 🤭

😘हर किसी को कोशिश करनी चाहिए कि उसके पास दादी-दादा या नाना नानी हों।

😘वे हमारे साथ प्रार्थना करते हैं और हमें प्यार करते हैं।

😘दादाजी एवं नाना जी दुनिया के सबसे समझदार आदमी होते हैं लेकिन  वे भुलकङ होते हैं। वे अपना चश्मा भी रखकर भूल जाते हैं!

 *हो सके तो इसे अन्य दादा-दादी,नाना-नानी को भेजें। यह उनका मन ख़ुश कर देगा।*


संकलन : अर्पणा श्रीवास्तव

 संत कबीर  नगर

🌹❤️🌹