ब्लॉग आर्काइव

सोमवार, 29 सितंबर 2025

बदलता परिवेश : प्रिया देवांगन "प्रियू"

 




कितना बदलेंगे अब रंग। दृश्य देख मन रहता दंग।।
सभी स्वार्थ के हैं इंसान। खुद संकट में डालें प्राण।।

काट रहे वन उपवन आज। करते महल बना कर राज।।
धधक रही जंगल में आग। लगा रहे कुदरत में दाग।।

सुबक रहे हैं शीशम साल। कहवा महुआ हैं बेहाल।।
चार चिरौंजी जामुन बेर। जाने कहाँ हुए हैं ढेर।।

बिखर गई चंदन की गंध। बिगड़ा नर-वन का संबंध।।
रेशम कीड़े करें विलाप। वन का नाश बना अभिशाप।।

खिले कहाॅं से उपवन फूल। बची जहाॅं बस मिट्टी धूल।।
धूमिल है इनकी पहचान। कल तक थे कानन की शान।।

नष्ट टहनियाँ पत्ते शाख। अंगारों में जलकर राख।।
भावुकता का घटता मोल। हे! मानव तू आँखें खोल।।

छुरी बगल में मुँह में राम। बेच लकड़ियाँ लेते दाम।।
मानव बिछा रहे हैं जाल। बुला रहे पर अपना काल।।

पुनः करो अब नव निर्माण। रहे सुरक्षित सबके प्राण।।
लें फिर नई कोंपलें श्वास। लाओ जग में नया उजास।।





प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें