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शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

राष्ट्रीय आम दिवस: अंजू जैन गुप्ता



 




 





आजादी की चाहत :स्वतंत्रता दिवस विशेष : बालकथा : रचना प्रिया देवांगन "प्रियू"

स्वतन्त्रता दिवस पर प्रिया देवांगन  प्रियू की रचना पुन: प्रकाशित  की जा रही है



 



           एक जंगल था बागबाहरा। हर पशु-पक्षी का अपना अलग समुदाय था। सब खुश थे। हाथियों का भी एक दल था। दल का नेतृत्व चंदा नाम की हथिनी करती थी। उस दल में एक हिरणी भी थी। नाम था किटी। उसे हाथियों के साथ रहने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी। उसकी विवशता थी कि उसके माता-पिता ने प्राण त्यागते समय उसे हाथी-दल को सौंप दिया था। शुरुआत में हाथियों का व्यवहार किटी के प्रति अच्छा था, पर समय के साथ उनके व्यवहार में परिवर्तन आने लगा। अब वे किटी के साथ गुलाम सा व्यवहार किया करते थे। किटी उनसे तंग आ चुकी थी। उसकी एक ही चाहत थी हाथियों से आजादी।

             किटी हमेशा सोचती रहती थी कि उसे आजादी कैसे और कब मिलेगी। अपने माता-पिता को याद कर के बहुत रोती थी। उसे इसलिए भी अच्छा नहीं लगता था क्योंकि यह सिर्फ हाथियों का समुदाय था। उन सब मे किटी अकेली महसूस करती थी। उनकी बातें भी किटी को नहीं समझ नहीं आती थी। चंदा हथिनी का एक बेटा था- मौजी। दल का अकेला वारिस था। मौजी और किटी में अच्छी मित्रता थी। दोनों साथ में खेलते कूदते थे। लेकिन चंदा को इन दोनों की दोस्ती बिल्कुल भी पसन्द नहीं थी । चंदा को किटी से काम करवाने में बस ज्यादा दिलचस्पी थी। उसे मौजी से दूर रखने का पूरा प्रयास करती थी।

          कुछ दिन बाद पन्द्रह अगस्त आने वाला था। जंगल के सभी जानवर पन्द्रह अगस्त मनाने की तैयारी में लग गए। हाथी समुदाय ने इस वर्ष बड़े धूमधाम से स्वतंत्रता दिवस मनाने का फैसला किया था। जंगल के सभी पशु-पक्षियों को भी आमंत्रित करने का निर्णय लिया गया। जंगल को दुल्हन की तरह सजाया गया। फल-फूल , मिठाई , बूंदी, नये-नये पकवानों की महक जंगल में फैलने लगी थी। कार्यक्रम में खेल-प्रतियोगिता, गीत-कहानी , भाषण शामिल थे। मौजी और किटी बहुत खुश थे। मौजी और किटी चंदा हथिनी से पूछ ही डाले- "यह सब हम क्यों कर रहें हैं ? जंगल को क्यों इस तरह सजाया जा रहा है ?" चंदा हथिनी मुस्कुराते हुए बोली- "पन्द्रह अगस्त सन् उन्नीस सौ सैंतालीस को हम अंग्रेजों के गुलामी से आजाद हुए थे। इसलिए हम हर साल इसे स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं; और तिरंगा भी फहराते हैं इस दिन।" तभी किटी खुशी से उछल पड़ी और बोली कि क्या मुझे भी यहाँ से आजाद कर दिया जाएगा। क्या मैं भी अपनी जाति-समुदाय में जा सकती हूँ।" चंदा किटी को घूरती हुई बोली- "बिल्कुल नहीं। तुम्हारे मम्मी-पापा ने तुम्हारी जिम्मेदारी हमें दी है। चिंता मत करो, तुम यहाँ से कहीं नहीं जाओगी।"

            किटी की आँखों से आँसू बहने लगे। मौजी ने चंदा हथिनी से धीमे स्वर में कहा- "माँ ! हम किटी को आजाद क्यों नहीं कर सकते हैं  ? उसे हिरण-समुदाय से अलग क्यों रखा गया है ? अभी आपने ही बताया कि स्वतंत्रता का मतलब आजादी होती है, फिर किटी को क्यों नहीं मिल सकती आजादी।" चंदा हथिनी बिना कुछ बोले वहाँ से चली गयी। उसके पीछे-पीछे मौजी भी जाने लगा। बार-बार मौजी चंदा को एक ही प्रश्न करने लगा। चंदा परेशान हो गयी। आखिर चंदा हथिनी सोचने लगी। फिर मौजी ने किटी को कहा- "तुम चिंता मत करो किटी। मैं तुम्हे आजादी दिलाऊँगा। देखना, स्वतंत्रता दिवस हम सब के लिए यादगार होगा।"

            15 अगस्त आया। जंगल में सुबह सात बजे चंदा हथिनी के द्वारा ध्वजारोहण होना था। चिड़ियों की चहक गूँजने लगी। सभी शाकाहारी जानवर- नीलगाय, चीतल, बारहसिंगा, खरगोश और हिरण समुदाय भी शामिल हुए। किटी हिरणियों को देख कर उछल पड़ी। जैसे ही उनसे मिलने जाने वाली थी कि चंदा हथिनी ने उसको रोक लिया। किटी सहम गयी। वहीं मौजी खड़ा देखता रहा। चंदा हथिनी ने ध्वजारोहण किया। राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत हुआ। फिर कविता पाठ शुरू किया गया। किटी और मौजी भी कविता पाठ में शामिल थे। सबने बारी-बारी से कविता, गीत, भाषण दिया। मौजी ने अपने भाषण में चंदा हथिनी की ओर इशारा करते हुए कहा- "देश तो आजाद हो गया है, फिर भी न जाने कितने लोग अभी भी गुलामी में जीवन यापन कर रहे हैं। कुछ लोग दूसरों को नौकर बनाकर रखा है। कहीं तो पूरे परिवार पर अपना हक जमा बैठे हैं। बच्चों को भी नहीं छोड़ा जा रहा है। दूसरे बच्चों का लालन-पालन की जिम्मेदारी लेकर उनका शोषण कर रहे हैं।" सब समझ रहे थे कि किटी हिरणी और चंदा हथनी की बात हो रही है। मौजी ने अपनी बात जारी रखी- "एक बच्ची को उसके परिवार से दूर रख कर किसी को क्या मिलेगा भगवान जाने। उस बच्ची की बद्दुआ जो कभी आगे बढ़ने नहीं देगी। माँ, आज आप किटी को आजाद कर दीजिए। याद है, आपने कहा था कि बेटा तुम्हे इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप मुझे तोहफा देंगी।। आज मैं सब के सामने आप से यही माँगता हूँ कि इस नन्ही-सी जान किटी को छोड़ दीजिए। इससे बड़ा तोहफा मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता। सभी के आँखों से आँसू बहने लगे। सबको लगने लगा कि छोटा सा बच्चा भरी सभा में बहुत अच्छी बातें बोल रहा है। माँ, आप बताइए कि अगर मुझे आप से दूर कर दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा। क्या आप जिंदा रह पाएँगी मेरे बिना। आज किटी के माता-पिता नहीं है तो आप उसके साथ ऐसा क्यों कर रही हैं।" अपने बेटे मौजी की बातों से चंदा का दिल पिघल गया। उसने किटी हिरणी को आजाद कर दी। सब ने मौजी की जी खोलकर तारीफ की। इतना छोटा सा बच्चा इतना बड़ा काम कर दिया। इस तरह किटी हिरणी को हाथियों से आजादी मिली, जिसकी उसे चाहत थी। 

                 



रचनाकार
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com

माई मम्मी इज़ द बेस्ट : शरद कुमार श्रीवास्तव


 



इन दिनो रश्मी को स्कूल मे टिफिन नहीं खाने की आदत सी हो गयी थी मम्मी उसके बैग मे टिफिन रख देती थीं. जब देखो तब स्कूल से बैग मे टिफिन बाक्स वैसे का वैसा बिना खाये चला आताा था . मम्मी ने बदल बदल कर टिफिन रखना चालू किया जैसे कभी पराठा कभी चिल्ला तो कभी उपमा तो कभी हलुआ और पूडी के साथ आलू भुजिया टिफिन मे रख देती थी लेकिन अब भी उसका टिफिन बाक्स वैसे का वैसे ही वापस आ जाता था । रश्मी के घर के बगल के घर मे पम्मी रहती थी वह भी रश्मी के साथ पढ़ती थी।  दोनो एक साथ खेलती कूदती भी थी . एक ही कैब से साथ स्कूल भी जाती थी. रश्मी और पम्मी की मम्मियाँ भी आपस मे दोस्त थी.
रश्मी की मम्मी रश्मी के स्कूल मे टिफिन नहीं खाने से बहुत दुखी थीं उनसे पम्मी की मम्मी ने जब पूछा तब रश्मी की मम्मी ने बताया कि आजकल रश्मी स्कूल से टिफिन का डिब्बा वैसे का वैसे बिना खाये वापस ले आती है. पम्मी की मम्मी हँसी फिर बोलीं कि जैसे दोनो साथ खेलती हैं वैसे दोनो एक टिफिन बाक्स से ही साथ साथ खाती भी हैं मैं डबल टिफिन रख देती हूँ दोनो एक साथ खा लेती हैं. मै तुम्हे बताने वाली थी पर बता नहीं पायी थी. रश्मी की मम्मी को अच्छा नहीं लगा वह बोलीं लगता है कि रश्मी को मेरा बनाया खाना पसंद नहीं है तुम्हारे हाथो का बनाया पसंद है. पम्मी की मम्मी बोली, नहीं बिलकुल नहीं . पहले पम्मी भी रश्मी के साथ शेयर करती थी तब पम्मी तुम्हारे बनाऐ टिफिन की बहुत तारीफ करती. ये तो बच्चे है उनको जो अच्छा लगने लग जाय. पम्मी की मम्मी फिर बोली कल तुम छुपा कर दोनो बच्चों के लिये टिफिन दे जाना मै पम्मी के टिफिन मे रख दूँगी फिर देखेंगे क्या होता है.
दूसरे दिन प्लान के हिसाब से दोनो बच्चो के लिये छिपाकर टिफिन पम्मी के घर रश्मी की मम्मी दे आई और रश्मी के टिफिन मे भी वही टिफिन रख दिया. रश्मी जब लौट कर आयी तो अपनी माँ से बोली मम्मी आज पम्मी की मम्मी ने इतना अच्छा टिफिन रखा था जिसे खा कर मजा ही आ गया. तुम भी मम्मी उनसे पूछ लो इतना अच्छा टिफिन कैसे बनाया था . माँ खा कर बस मजा आ गया. माँ ने कहा तूने अपना टिफिन फिर नहीं खाया ?  रश्मी की मम्मी ने फिर रश्मी को उस का टिफिन उसे दिखाया और पूछा क्या यही टिफिन था . रश्मी ने एक कौर खाया फिर बोली हाँ मम्मी यही था . क्या आँटी मेरे लिये अलग से टिफिन दे गईं थी.  तब तक पम्मी की मम्मी भी आ गईं वह बोली कि नही रश्मी तुमने जो टिफिन स्कूल मे खाया वह और यह टिफिन दोनो तेरी मम्मी ने बनाया था. रश्मी बोली यह तो खूब रही आप दोनो मिलकर मुझे बुद्धू बना रहे थे. पम्मी की मम्मी के जाने के बाद रश्मी अपनी मम्मी के गले मे लिपट गई बोली माई मम्मी इज द बेस्ट ! फिर मम्मी को दुखी देखकर उनसे बोली मम्मी मुझे माफ कर दो कल से मै तुम़्हारे हाथ का बनाया टिफिन ही खाऊँगी ।।




शरद कुमार  श्रीवास्तव 




बारम्बार नमन करता हूँ। : वीरेन्द्र सिंह बृजवासी




     

      जिसने  मेरा  अंकुर   पाला

      नौ माह तक  मुझे  संभाला

      धरती पर  लाकर  माता  ने

      जीवन रसको मुख में डाला

      मैं प्यारी  माँ  के  चरणों  में

      बारम्बार  नमन   करता  हूँ।


      दुविधाओं  से  मुझे  बचाया

      सुविधाओं  का  ढेर  लगाया

      मेरी   नींदों    को   सहलाने

      माँ  ने   गीत  सलोना  गाया

      मैं न्यारी  माँ  के  चरणों  में

      बारम्बार  नमन   करता  हूँ।


      सब पर ही  ममता बरसाती

      संतानों  पर   जान   लुटाती

      लिंग  भेद  करने  वालों  पर

      नहीं ज़रा भी रहम  दिखाती

      मैं सुखकारी  माँ  चरणों  में

      बारम्बार   नमन   करता  हूँ।


       तेरे    आशीषों    से   माता

       जीवनका हर पल मुस्काया

       प्रथम गुरू बनकर  माँ  तूने

       भाषाओं  का  ज्ञान  कराया

       मैं हितकारी  माँ  चरणों  में

       बारम्बार  नमन   करता  हूँ।


       तेरी   मुस्कानों   पर  माता

       सकल  देव जाते बलिहारी

       तेरी  गोदी   में   आने   को

       बन जाते  बालक अवतारी

        मैं  जगतारी माँ  चरणों में

        बारम्बार  नमन  करता हूँ।

             

   



               वीरेन्द्र सिंह ब्रजवासी

               मुरादाबाद/उ,प्र,                             9719275453


       

       











सोना समझ गयी :प्रिया देवांगन "प्रियू"


 




   "मैं बहुत थक गयी हूँ। अब एक कदम भी नहीं चला जाता है मुझसे। सुबह से शाम तक बस; सिर्फ काम ही काम। सुनिए जी, आज मैं घर पर ही रहूँगी। आप जाइये काम पर।" नन्हीं चींटी सोना ने अपने पति डंबू से कहा। 


          डंबू ने सोना को चिढ़ाते हुए कहा - "ओह ! तो आज मेरी सोना थक गई है। आराम फरमाएगी। अच्छा...!"

          डंबू की बात से सोना तमतमा गयी। कहने लगी- "मैं आपसे ज्यादा वजनदार सामान उठाती हूँ, लेकिन आज थोड़ी थकान महसूस हो रही।" डंबू ने कहा- "ठीक है, आज तुम आराम कर लो। कल साथ में चलेंगे।" सोना ने मुस्कुराते हुए कहा- "लो आप जाइए।" डंबू काम पर चला गया।

          दिन भर डंबू काम करता रहा। शाम को घर वापस आया। खाने का कुछ सामान ले आया था। घर के अंदर रखा। सोना से कहा - "सोना ! तुम्हारी तबीयत कैसी है ?" 

          सोना सेब के टुकड़े को चबाते हुए मजे से बोली- "मैं बिल्कुल अच्छी हूँ। भली चंगी हूँ।"  

          सोना घर में रहने का बहुत आनंद ले रही थी। डंबू को बात समझ आ गयी। उस समय उसने कुछ नहीं कहा। अगले दिन सुबह डंबू ने सोना से भोजन की व्यवस्था के लिए अपने साथ चलने की बात कही। सोना फिर बहाना मारने लगी। लेकिन डंबू अच्छी तरह समझ गया। सोना को समझाते हुए कहा- "देखो सोना, मुझे पता है कि तुम काम पर नहीं जाना नहीं चाहती। क्यों कर रही हो ऐसा ?"

          डंबू का मुँह ताकती हुई सोना उसकी बातें सुन रही थी- "हम चींटीं हैं। हम घर पर बैठ कर आराम नहीं कर सकते। बहाना तो इंसान बनाते हैं; हम चींटियाँ नहीं। जब तक मेहनत नहीं करेंगे, भला हमें भोजन कैसे और कहाँ से मिलेगा ?" तभी बीच में ही सोना का कहना हुआ - "हाँ, तुम सही कह रहे हो। जीवन में मेहनत जरूरी है।"

डंबू बोला - "हाँ बिल्कुल। अब सर्दी का मौसम आ रहा है। भोजन ढूँढना मुश्किल होगा। इस बात को समझो। चीटियाँ कभी हार नहीं मानतीं। जब कोई इंसान कमजोर पड़ने लगता है तो हम से ही मेहनत करने की सीख लेता है कि एक छोटा सा जीव जब हार नहीं मानता है तो हम क्यों हार माने। इंसानों को हमारी मेहनत,एकता और साहस ही मजबूत बनाता है। धरती में सबसे ज्यादा मेहनतकश प्राणी के रूप हमारी गिनती होती है। तुम ऐसे कमजोर नहीं पड़ सकती।" सोना को डंबू की बातें समझ में आ गयी। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। फिर डंबू और सोना दोनों भोजन की तलाश में निकल पड़े।

       

    

प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़ 







रानी लक्ष्मी बाई : शरद कुमार श्रीवास्तव




 वाराणसी मे 19 नवम्बर 1835 को जन्मी झांसी की रानी का नाम बहुत श्रद्धा से स्वतंत्रता सेनानियों मे लिया जाता है।   भारत के बहुत स्थानों मे अपनी कन्याओं का नाम करण लोग इसी वीरांगना झासी रानी के नाम पर करते है. झासी की रानी का बचपन मे नाम मणिकर्णिका और प्यार का नाम मनु था।  ये पिता मोरोपन्त और माता भागीरथी देवी की सन्तान थीं इनकी माता भागरथी देवी का देहान्त मनु जब मात्र चार वर्ष की थी तभी हो गया था।  पिता, पेशवा बाजीराव के यहाँ कार्यरत थे।  मनु की घर मे देख भाल सुचारु रूप से नही हो सकने की वजह से इनके पिता इन्हे भी पेशवा के दरबार मे ले गये।   पेशवा के बच्चो के साथ मनु की शिक्षा हुई।  मनु ने बचपन मे ही पढाई लिखाई के साथ अस्त्र शस्त्रो मे निपुणता प्राप्त की।   स्वभाव से चंचल होने की वजह से मनु को लोग प्यार से छबीली भी कहते थे।   बाजीराव पेशवा के पुत्र नानाराव के साथ इनका बचपन बीता।   वो नाना के साथ ही पढ़ती और खेलती थी।   एक बार नाना हाथी पर सवारी कर रहे थे तो मनु ने भी हाथी पर बैठने को कहा तो किसी ने ध्यान नही दिया।  मनु नाराज हो गई और बोली कि मेरे भाग्य मे एक नहीं सौ हाथी का सुख लिखा है।   
कालान्तर मे मनु का विवाह बड़ी धूमधाम से झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ. मनु का नाम राजा ने लक्ष्मीबाई रखा।  रानी को घर मे बंधकर रहना पसन्द नहीं था।  उन्होंने राजा से कहकर  महल मे ही स्त्रियो के लिये व्यायाम शाला बनवाई और एक स्त्री सेना भी गठित की।   राजा गंगाधर राव रानी दक्षता से बहुत प्रभावित थे रानी को अच्छे घोडो की भी खूब पहचान थी।   एक बार घोडों का एक व्यापारी दो घोड़े लाया।  रानी ने एक घोड़े का दाम 1000 रुपये तो दूसरे का दाम पचास रुपये लगाए।   पूछने पर रानी ने बताया एक घोड़ा उम्दा किस्म का है जबकि दूसरे घोड़े की छाती पर चोट है।   रानी दया वान भी बहुत थी एक बार एक गाँव से गुजरते समय उस गाँव के कुछ निवासियों को सर्दी मे ठिटुरते हुऐ देखा।   उनका मन द्रवित हो गया और शीघ्र ही उन्होने उन लोगो के लिये गरम वस्त्रों की व्यवस़्था की।
कुछ समय बाद रानी के एक पुत्र हुआ. झाँसी मे आनन्दोत्सव मनाया गया। परन्तु यह आनन्द क्षणिक था बालक कुछ महीनो बाद बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।   शोकाकुल राजा गंभीर रूप से बीमार पड़ गये।   लोगो की सलाह पर राजा ने अपने परिवार के पाचवर्षीय बालक को गोद ले लिया।  अगले ही दिन राजा परलोक सिधार गये। रानी पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। अंग्रेजो ने सोचा यह अच्छा मौका है झाँसी को हासिल करने का.. रानी ने राजा के दत्तक पुत्र के अभिभावक के रूप मे सत्ता की बागडोर अपने हाथ मे ली थी।इस अंग्रेजो ने रानी को पत्र भेजा कि राजा के कोई पुत्र नहीं है इसलिये झाँसी पर अब उनका अधिकार होगा।  पत्र पाकर रानी ने उसका कड़ा विरोध किया और कहा कि मै अपनी झाँसी नहीं दूंगी।   झाँसी की स्वामी भक्त जनता रानी के साथ एक स्वर हुई. रानी नेे कुशल किले बन्दी की. गौस खाँ और खुदाबक्श तोपची वफादार सरदारों और सैनिको के बुलन्द हौसलो ने अंग्रेजो की तोपों बन्दूको से लैस सेना के दाँत खट्टे कर दिये।  आठ दिनो के निरन्तर युद्ध किया। अंग्रेजों ने जब देखा कि ऐसे विजय हासिल होने वाली नहीं है तो छल से एक सरदार दूल्हा सिंह को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया।  रात मे उस गद्दार सरदार ने किले के दरवाजे खोल दिये।  बस फिर क्या था फिरंगियों की सेना महल मे प्रवेश कर गई उसने खूब लूटपाट मचाई बच्चो और स्त्रियों को काट ने लगे।   रानी लक्ष्मी बाई के कुशल नेतृत्व मे सैनिको ने बहुत बहादुरी से फिरंगियों की विशाल सेना का सामना किया।
रानी के विश्वस्त लोगो ने अपनी रणनीति की तहत कालपी की तरफ कूच करने की सलाह दी।  रानी कालपी की तरफ बढ़ रही थी। घोड़ों पर सवार बन्दूक धारी सैनिक रानी पर आक्रमण कर रहे थे कि एक गोली रानी की जाँघ पर लगी रानी की गति मे अवरोध हुआ कि घुड़सवार पास आ गये. थकी रानी के साहस मे कोई कमी नहीं थी एक घुड़ सवार पास आकर हमला कर रहा था कि रानी की तलवार ने बिजली की गति से उस पर प्रहार कर उसेे परलोक पहुँचा दिया।  इसी बीच लक्ष्मी बाई की प्रिय सखी की चित्कार सुनकर उसका संहार करने वाले अंग्रेज घुड़सवार को यमलोक पहुँचा दिया था।   रानी ने पुनः घोड़ा दौडाया परन्तु घोड़ा प्रयास के बावजूद एक नाला पार नहीं कर पाया कि एक अंग्रेज सैनिक ने रानी के सिर पर तलवार से वार किया और सीने मे संगीन भोंक दी परन्तु वीरान्गना रानी ने उस हालत मे भी अपने मारने वाले को मार दिया। रानी के स्वामीभक्त सिपहसालार गुलाम मोह्म्मद ने वीरता से अंग्रेजो को खदेड़ दिया और रामाराव देशमुख रक्त रंजित रानी को पास ही गंगादास की कुटिया मे लाये जहाँ मृत्युआसन्न रानी ने गंगाजल पी कर 22 वर्ष की अल्पायु मे 18 जून 1858 को देश मे क्रान्ति की एक अमर ज्योति जलाने वाली वीरांगना ने अपने शरीर का त्याग किया
इस संदर्भ मे कवित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ इस वीरांगना की श्रद्धा मे समर्पित हैं
बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झासी वाली रानी थी।।




शरद कुमार श्रीवास्तव