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गुरुवार, 16 मार्च 2017

डॉ प्रभास्क पाठक की रचना : होली के रंग





होली खेल रहा गुलमोहर
संग-संग नीम पलाश है,
बासंती गुल खिला रहा
महुआ चूने की आस है।



हुड़दंगी बच्चों की टोली
करती आई होली- होली,
सरपट भागा भागी करते
घर-घर खुशियों की ले  झोली।


सूखी लकड़ी और डमारा
सजी होलिका झाड़ झंकारा,
लगी सत्य की चिनगारी जब
जली बुराई,दुख हारा सारा।


उधर गुलाब की कलियाँ चटकी
पीत, हरित,केशर गुलाल की,
धूल उड़ी मग- मग उमंग  की
फाग चैत का कहता मन की। 







                           डाॅ प्रभास्क।
                           रांची  झारखंड 


सोमवार, 6 मार्च 2017

महेन्द्र देवांगन की रचना : बिल्ली मौसी



बिल्ली मौसी 

म्याँऊ करते बिल्ली आई।


लगी चाटने दूध मलाई ।


डंडा लेकर मौसी आई ।


बिल्ली को वह खूब दौड़ाई ।


जान बचाकर भागी बिल्ली ।


देखकर चूहा उड़ाये खिल्ली ।


भागते भागते थक गई बिल्ली ।


पहुँच गई वह सीधी दिल्ली । 









महेन्द्र देवांगन "माटी"

पंडरिया छत्तीसगढ़ 

शरद कुमार श्रीवास्तव की रचना : छोटे बच्चों संभाल कर खेले होली



होली को आयुष  घर मे जैसे ही  घुसा सारा घर हँस  पड़ा।   वह बाहर से एकदम काले मुहँ वाला बन्दर बन कर वह आया  था       बाहर  रोड  पर   किसी ने  उसके  चेहरे  पर  काला रंग लगा दिया  था ।   आयुष  के  पापा बोले  आप सब क्यों  हँस  रहे  हैं  ।   मनीष  बोल पड़ा  कि किसी  बच्चे  ने आयुष के  चेहरे पर  काला रंग पोत  दिया  है  ।  हमारी  कालोनी  में  तो सब लोग  सफाई  से होली खेलते हैं कोई  गन्दे रंगों  से नही खेलता  है ।  पापा   आयुष से पूछो यह मेन  रोड की तरफ होली  खेलने  गया  ही क्यों  था ।   पापा  ने कहा कि  यह ठीक  है  कि  होली के  हुड़दंग  मे छोटे  बच्चों  को  बहुत  एहतियात  के  साथ  होली  खेलना चाहिए  ।  बच्चों  की  त्वचा  बहुत  कोमल  होती है  और  हुडदंग  में  लोग खराब  रंगों  का  भी  इस्तेमाल करते हैं  जिससे स्किन इंफेक्शन  होने  का  डर रहता  है  ।    इसीलिए  मैंने  तुम सब  लोगों  को हाथ  पैरों  और मुह मे  मास्चराइजर  तथा  बालों  में जैतून  का  तेल   लगवाया था
मनीष  बोला  कि   पापा होली  तो मेल मिलाप और प्रेम - सौहार्द    का त्योहार  है  हमे सूखे  अबीर गुलाल  से  होली खेलना  चाहिए  ।    पापा आगे  बोले  हमे प्राकृतिक  रंग  भी उपलब्ध  हैं  जैसे  टेसू के  फूल इत्यादि   जो  गांवों  में  तो मिल  जाते हैं  और  पंसारी की  दुकानों  पर  भी  मिल  जाते उनका गीला रंग  बना  कर  होली खेलने  का  मजा ही   कुछ  और है  ।  
मम्मी  ने  पकवानों  के  साथ  खाना  भी  लगा  दिया  ।   आज के  दिन  तो तरह  तरह के  पकवान  भी  बनते हैं  और हर जगह  थोड़ा  बहुत  तो खाना  ही  पड़ता  है  इसलिए  मम्मी  ने  खाने  की  टेबल पर  कहा  कि  बच्चों  बाहर अधिक   खाना खाने  से  बचना  अगर  खाना  ही  पडे तो बिल्कुल  नाममात्र  ही  खाना  चाहिए ।
  शाम  को  घर के  सब लोग  दादी  बाबा  के  घर  पर  गये दादी  बाबा  ने सब बच्चों  को  गले लगाया  और होली का  उपहार  दिया




                                   शरद कुमार  श्रीवास्तव

डॉ प्रदीप शुक्ल की पुरस्कृत पुस्तक " गुल्लू का गांव " से रचना : जंगल में होली






 होली के इस शुभ अवसर पर

आज शेर ने सभा बुलाई 

सुनो सुनो सब जंगल वालों 

चिल्लाती है कोयल ताई



भरी सभा में किंग शेर ने 

अपना ये फरमान सुनाया 

रंग नहीं खेला जाएगा 

इस जंगल में अब से भाया 



पर होली में हम तो मालिक 

हरदम रंग खेलते आये 

बोल सामने खड़ा हो गया 

पलटू गदहा मुँह लटकाये



लाल लोमड़ी लच्छो बोली 

ठीक कह रहे हैं राजा जी 

मिलावटी रंगों से देखो 

मुझको लगी जान की बाजी 



कल्लू कौआ बोल पड़ा बस 

सच ही कहा लोमड़ी नानी 

रंग न कोई चढ़ता मुझ पर 

हो जाऊँ मैं पानी पानी 



हाथी बोला सही बात है 

पानी सब गंदा हो जाता 

कई दिनों तक गंदा पानी 

मुझसे पिया पिया ना जाता 



तभी उछल कर खड़ा हो गया 

रामभजन बन्दर का बच्चा 

होली में गर रंग न होंगे 

मुझको नहीं लगेगा अच्छा 



उसके पीछे खड़ी हो गई 

जंगल भर की बच्चा टोली 

धीरे धीरे चली शेरनी 

बीच सभा में आ कर बोली 



ऐसा करते हैं राजा जी 

सूखी होली हम खेलेंगे 

औ मिलावटी रंगों को हम 

फूलों के रँग से बदलेंगे 



सबने मिलकर फूल सुखा कर 

तरह तरह का रंग बनाया  

इस होली में सब ने खेला 

कोई तनिक नहीं घबराया.



                                 डॉ. प्रदीप शुक्ल
                                लखनऊ  




अखबार वाला







सुबह सुबह से अखबार लिए
घूम रहे हैं  गलियों में ।
अखबार ले लो भैया 
आवाज लगाये शहरों में ।


सर्दी गर्मी बरसातो में 
अखबार लेकर आते, 
एक एक पैसा जोड़ जोड़
अपना जीवन चलाते ।


नया नया ताजा खबर 
लोगों को दे जाते ,
बच्चे बूढ़े या युवा हो
सबका ज्ञान बढ़ाते ।


चाय की चुस्की लेते बाबा 
रोज अखबार पढ़ते 
देश दुनिया की खबरों को
सब पर नजर रखते ।



                               प्रिया देवांगन "प्रियू" 

                              गोपीबंद पारा पंडरिया 

                               जिला -- कबीरधाम  ( छ ग )

Email --priyadewangan1997@gmail.com

शरद  कुमार  श्रीवास्तव  की रचना :मम्मी देखो प्यारे बादल



मम्मी  देखो प्यारे  बादल

 मम्मी  देखो प्यारे  बादल
आसमान मे उडते बादल
हैं सफेद कुछ भूरे बादल
मम्मी  कित्ते  सारे बादल

सागर से गागर भर लाते
धरती की प्यास बुझाते
वर्षा करते नभ से थल पे
देखो कितने प्यारे  बादल

शरद  कुमार  श्रीवास्तव





भुवन बिष्ट की रचना : होली गीत



होली  गीत

     रंगो का आया त्यौहार,



  
मनभावन आयी होली,
रंग अबीर खूब उड़ेगा,
हो मीठी सबकी बोली,
मनभावन आयी होली,
रंग भरी पिचकारी से,
धोयें आओ मन का मैल,
राग द्वेष न हो मन में,
आओ हम सब हों तैयार,
रंगों का आया त्यौहार,
खुशियों से भर लें झोली,




मनभावन आयी होली,
आपसी प्रेम भाव फैलायें,
मानवता ही हम दिखलायें,
जीत सदा ही सच्चाई की,
होती होली भी सिखलाती,
दहन होलिका भी है होता,
राह पर्व भी हमें दिखलाता,
सत्य पथ प्रेम भाव अपनायें,
मन में सदा ही हो संचार,
रंगो का आया त्यौहार,
मनभावन आयी होली....
             

                              भुवन बिष्ट
                             रानीखेत (उत्तराखण्ड)

अंजू निगम की बाल कथा : छगनु का सपना



छगनु के सपने

एक गाँव में एक गरीब लड़का छगनु रहता था|  वह बहुत ही आलसी था। रात-दिन बिस्तर में लेटा रहता था  | उसकी माँ उसके आलसपने से परेशान थी और उससे कुछ काम करने को कहती रहती थी  |
    माँ के कहने पर छगनुजी कुछ काम करने के लिए गये 
  | उन्होंने   यहाँ वहाँ काम करके  कुछ पैसे जमा कर लिये |  छगनुजी   पैसे  कमा  लेने  पर बहुत  खुश हो गए ।    उनकी   माँ ने आते समय छगनु को  दूध लाने को भी कहा था| छगनु जो दूध ला़ये तो माँ ने दूध के बर्तन  को छींके पर टांग दिया|   

 छगनु काम कर के थक गये थे।  छींके  के  पास  ही  वे लेट गये और  लेटते ही वे  सो गये|   सोते ही वे  सपने  देखने लगे|   सपने  में  दूध ऊँचे दाम में बेचकर, छगनु ने इतने पैसे जमा कर लिया, कि उन पैसो से वो एक बकरी ले आये हैं |   फिर उन्होंने  बकरी का दूध बेच काफी पैसे जमा कर लिया |   उसके  बाद वे  एक और बकरी ले आये|   अब  दो बकरियों  का खूब दूध होने लगा , तब एक गाय भी  खरीद  लाए  |    छगनु जी खूब अमीर हो गये थे |  उन्हें  अपना  टूटा घर अच्छा नहीं  लगता था ,   सो बड़ा सा घर भी बनवा लिया| फिर शादी करके एक सुदंर सी पत्नी को  घर ले आये और छगनु अपने परिवार के साथ खूब खुश हो रहने लगे |
     सपने में  छगनु ने  देखा  कि उनके  घर मे चोर घुस आये हैं |  ,  खटर-पटर की  आवाज  सुनकर छगनु की आँख  खुल गयी | फिर तो वो भागे चोरो के पीछे| चोर आगे-आगे और छगनु पीछे-पीछे| चोर तो हाथ आये नहीं मगर आखिरी चोर पर छगनु ने जम कर लात मारी |   छगनु ने इतनी   जोर से उस चोरी को  पैर मारा कि जोर से किसी बरतन गिरने की आवाज आयी जिससे छगनु की सचमुच  मे  नींद टूट गई।   वे देखते क्या  है  कि  छींके का बरतन जमीन में गिरा और सारा दूध जमीन मे बिखर गया |  उसके  साथ ही छगनु के सारे सपने भी बिखर गये|😣

                               अंजू निगम
                               इंदौर-मध्यप्रदेश

टिप्पणी :- इस रचनाकार  के  बारे  में  संक्षिप्त  परिचय  लेखिका  के  ईमेल  से 
मैं श्रीमती अंजू निगम, लेखन के क्षेञ में सक्रिय हूँ| बच्चो  की कहानी लिखने का ये मेरा पहला प्रयास हैं| मेरे दैनिक भास्कर की साप्ताहिक पञिका'मधुरिमा' में व 'अद्भुत समाचार'( लखनऊ से प्रकाशित) में लेख छप चुके हैं| आजकल मैं  एक ई- पेपर के लिये लेख लिख रही हूँ|


होली है


चलो फिर से

गुलाल संग बोलें-होली है,भाई होली है।

पिचकारी ले, निकली बच्चों की टोली है।

जीवन को आनंद के रंग में भिंगो ली,

अमिया पर बैठी कोयल है बोली,

‘चलो बंधुजन मिल खेले होली।’

चिप्स, नमकीन, गुझिया, दहीबड़े

दिल को भाते हैं पकवान बड़े।

ढोल, मजीरे मिलकर बजाते हैं



चलो फिर से

फगुआ मिलकर गाते हैं

पौराणिक कथाएॅं गुनगुनाते हैं।

अबीर संग सभी झूमते गाते हैं

‘फागुन का ऋतु सभी को भाता,

गाॅंव-गाॅंव है, देखो फगुआ गाता।’

अंग-अंग अबीर के रंग में डूबा,

तन-मन स्नेह रंग में भींगा।

लाल, नीली, हरी, पीली

सम्पूर्ण धरा रंग-बिरंगी हो - ली।

गिले-सिकवे भूले, सखा-सहेली

सकारात्मकता का प्रचार करती आई, होली।

गुलाल संग बोलो-होली है, होली।

              


                                        अर्चना सिंह जया

                                         इन्दिरापुरम , गाज़ियाबाद 

प्रभु दयाल श्रीवास्तव  की रचना : उपदेश




                             उपदेश

  
 चूहा बोला बिल्ली दीदी,
  अदरक वाली चाय पिला।
   मुंह गंदा है भाग यहां से,
  पहले ब्रश मंजन कर आ।





                                                 ऐसा कहकर झपटी बिल्ली,
   खूब मजे से दूध पिया।
   खुद का मुंह बिल्कुल गंदा था,
   चूहे को उपदेश दिया।



                        प्रभु दयाल श्रीवास्तव
      (बच्चों  के  वरिष्ठ  और ख्याति  प्राप्त  रचनाकार )
                       छिन्दवाड़ा
                       मध्य  प्रदेश