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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

जन्माष्टमी व्रत की महिमा

 जन्माष्टमी व्रत की महिमा

               

जन्माष्टमी के विषय में हमारे शास्त्रों में विशेष रूप से चर्चा वर्णित है। हमें जन्माष्टमी व्रत-उपवास क्यों करना चाहिए, इससे जन-मानस को क्या लाभ मिल सकता है? आपको यह जानकारी है कि कृष्ण (कन्हैया) भगवान् विष्णु के अवतार हैं। भगवान विष्णु पुरी सृष्टि का पालन करते हैं। यदि इनके प्रति हम श्रद्धा पूर्वक भावनापूर्ण कोई भी कार्य करते हैं तो इससे हमें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जन्माष्टमी व्रत-उपवास की महिमा :

जन्माष्टमी का व्रत रखना चाहिए, बड़ा लाभ होता है। इससे सात जन्मों के पाप-ताप मिटते हैं।

जन्माष्टमी एक तो उत्सव है, दूसरा महान पर्व है, तीसरा महान व्रत-उपवास और पावन दिन भी है।

‘वायु पुराण’ में और कई ग्रंथों में जन्माष्टमी के दिन की महिमा लिखी है। ‘जो जन्माष्टमी की रात्रि को उत्सव के पहले अन्न खाता है, यानी भोजन कर लेता है, वह नराधम है’ - ऐसा भी लिखा है, तथा जो उपवास करता है, जप-ध्यान करके उत्सव मना कर खाता है, वह अपने कुल की 21 पीढ़ियाँ तार लेता है और वह मनुष्य परमात्मा को साकार रूप में अथवा निराकार तत्त्व पाने में सक्षमता की तरफ बहुत आगे बढ़ जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि व्रत की महिमा सुनकर मधुमेह वाले या कमजोर लोग भी पूरा व्रत रखें। ऐसे व्यक्ति को भावपूर्ण होकर नियम का पालन करना चाहिए। बालक, अति कमजोर तथा बूढ़े लोग अनुकूलता के अनुसार थोड़ा फल आदि खायें। 

       विशेष जानकारी : जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है। उसमें भी जन्माष्टमी की पूरी रात जागरण करके जप-ध्यान का विशेष महत्त्व है। जिसको मंत्र का थोड़ा जप करने को भी मिल जाय, उसके त्रिताप नष्ट होने में देर नहीं लगती।

‘भविष्य पुराण’ के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत संसार में सुख-शांति और प्राणीवर्ग को रोगरहित जीवन देनेवाला, आयु बढ़ाने वाला, अकाल मृत्यु को टालनेवाला, गर्भपात के कष्टों से बचानेवाला तथा दुर्भाग्य और कलह को दूर भगानेवाला होता है।

आप धर्म से जुड़े एवं अधर्म का नाश करें।   

  


 









डा. पशुपति पाण्डेय

सहायक महा प्रबंधक  (रिटायर्ड)

भारतीय स्टेट बैंक  

स्थानीय प्रधान  कार्यालय  

लखनऊ       

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

गीजा के पिरामिड


 गीजा के पिरामिड 








भारत की तरह ही मिस्र की सभ्यता भी बहुत पुरानी है और प्राचीन सभ्यता के अवशेष वहाँ की गौरव गाथा कहते हैं। यों तो मिस्र में १३८ पिरामिड हैं और काहिरा के उपनगर गीजा   मे  सामान्य विश्वास के विपरीत सिर्फ गीजा का ‘ग्रेट पिरामिड’ ही प्राचीन विश्व के सात अजूबों की सूची में है। दुनिया के सात प्राचीन आश्चर्यों में शेष यही एकमात्र ऐसा स्मारक है जिसे काल प्रवाह भी खत्म नहीं कर सका।

यह पिरामिड ४५० फुट ऊंचा है। ४३ सदियों तक यह दुनिया की सबसे ऊंची संरचना रहा। 19 वीं सदी में ही इसकी ऊंचाई का कीर्तिमान टूटा। इसका आधार १३ एकड़ में फैला है जो करीब १६ फुटबॉल मैदानों जितना है। यह २५ लाख चूनापत्थरों के खंडों से निर्मित है जिनमें से हर एक का वजन २ से ३० टनों के बीच है। ग्रेट पिरामिड को इतनी परिशुद्धता से बनाया गया है कि वर्तमान तकनीक ऐसी कृति को दोहरा नहीं सकती। कुछ साल पहले तक (लेसर किरणों से माप-जोख का उपकरण ईजाद होने तक) वैज्ञानिक इसकी सूक्ष्म सममिति (सिमट्रीज) का पता नहीं लगा पाये थे, प्रतिरूप बनाने की तो बात ही दूर! प्रमाण बताते हैं कि इसका निर्माण करीब २५६० वर्ष ईसा पूर्व मिस्र के शासक खुफु के चौथे वंश द्वारा अपनी कब्र के तौर पर कराया गया था। इसे बनाने में करीब २३ साल लगे।

म्रिस के इस महान पिरामिड को लेकर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं कि बिना मशीनों के, बिना आधुनिक औजारों के मिस्रवासियों ने कैसे विशाल पाषाणखंडों को ४५० फीट ऊंचे पहुंचाया और इस बृहत परियोजना को महज २३ वर्षों में पूरा किया? पिरामिड मर्मज्ञ इवान हैडिंगटन ने गणना कर हिसाब लगाया कि यदि ऐसा हुआ तो इसके लिए दर्जनों श्रमिकों को साल के ३६५ दिनों में हर दिन १० घंटे के काम के दौरान हर दूसरे मिनट में एक प्रस्तर खंड को रखना होगा। क्या ऐसा संभव था? विशाल श्रमशक्ति के अलावा क्या प्राचीन मिस्रवासियों को सूक्ष्म गणितीय और खगोलीय ज्ञान रहा होगा? विशेषज्ञों के मुताबिक पिरामिड के बाहर पाषाण खंडों को इतनी कुशलता से तराशा और फिट किया गया है कि जोड़ों में एक ब्लेड भी नहीं घुसायी जा सकती। मिस्र के पिरामिडों के निर्माण में कई खगोलीय आधार भी पाये गये हैं, जैसे कि तीनों पिरामिड आ॓रियन राशि के तीन तारों की सीध में हैं। वर्षों से वैज्ञानिक इन पिरामिडों का रहस्य जानने के प्रयत्नों में लगे हैं किंतु अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है।

मिस्र के डंडेरा  नाम की जगह पर एक प्राचीन मंदिर है जिसे मिस्र वासियो ने अपने एक भगवान् हैथोर के लिए बनाया था।  इस मंदिर की दीवार पे एक चित्र बना हुआ है जो प्राचीन मिस्र में बिजली की उपस्थिति होने का संकेत देता है ,, इसे डंडेरा लाइट , कहाँ जाता है।   और उस मंदिर को डंडेरा लाइट कॉम्प्लेक्स के नाम से आज भी जाना जाता है


शरद कुमार श्रीवास्तव 

(विकिपीडिया से साभार)

 शुतुरमुर्ग


और बकरी की दोस्ती


(बाल कथा)


एक बड़े से वन्य उद्यान में एक लंबा-सा शुतुरमुर्ग और एक चंचल बकरी रहते थे। दोनों का स्वभाव अलग था, लेकिन वे बहुत अच्छे मित्र थे। शुतुरमुर्ग तेज़ दौड़ता था और बकरी ऊँची-ऊँची चट्टानों पर आसानी से चढ़ जाती थी।


एक दिन दोनों भोजन की तलाश में निकले। रास्ते में उन्हें एक छोटा मेमना गहरे गड्ढे में फँसा हुआ दिखाई दिया। वह डर के मारे ज़ोर-ज़ोर से मिमिया रहा था।


बकरी तुरंत चट्टान से उतरकर गड्ढे के पास पहुँची, लेकिन अकेले मेमने को बाहर नहीं निकाल सकी। उसने अपने मित्र शुतुरमुर्ग को आवाज़ दी।


शुतुरमुर्ग तेज़ी से दौड़कर आया। उसने अपनी लंबी गर्दन नीचे झुकाई। मेमने ने उसकी गर्दन को सावधानी से पकड़ लिया। बकरी ने पीछे से सहारा दिया। दोनों ने मिलकर मेमने को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।


मेमना खुशी से उछलने लगा और बोला, "आप दोनों ने मेरी जान बचा ली।"


शुतुरमुर्ग मुस्कुराया और बोला, "जब मित्र मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी कठिन काम आसान हो जाता है।"


बकरी ने कहा, "हर किसी में कोई न कोई विशेष गुण होता है। हमें अपने गुणों का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए।"


उस दिन से वन्य उद्यान के सभी जानवर उनकी दोस्ती और सहयोग की प्रशंसा करने लगे।


शिक्षा: मिल-जुलकर किया गया कार्य कठिन से कठिन समस्या का भी सरल समाधान बन जाता है।




डॉक्टर मंजू यादव

मेरा गाँव बरगद की छा॔व

 कितना प्यारा लगता गाँव।

बैठे सभी बरगद की छाव


चहुंओर छाई हरियाली।।

वन,उपवन को सीचे माली।।

 

मिल,जुल खेले खेल निराले।।

टोली बना चलें मतवाले।।



बहती हवा सुगन्धित सर,सर।।

पत्ते सारे करते फर, फर।।


सावन में झूले पड़ जाते।।

मेघ,मल्हार सभी मिल गा ते।।


बच्चे मिलकर पैग बढ़ाते।।

पैर बड़ा डाली छू आते।।


आती जब होली मस्तानी।।

रंग लगा करते मनमानी।।


दिवाली पर दीप जलाते।।

मिल जुल खील बताशे खाते।।


ऐसा है कुछ गाँव हमारा।।

लगता हमको सबसे प्यारा।।




मंजू यादव एटा

शनिवार, 8 अगस्त 2026

खाकर चूहे बिल्ली बोली। नहीं हमारा पेट भरा।


 

खाकर चूहे बिल्ली बोली।

नहीं हमारा पेट भरा।

जाकर खोजू चुन्नू के घर,

 खाने का सामान जरा।।


म्याऊ, म्याऊ करती फिरती।

उछले  कूदे, कभी न गिरती।


छेड़ो जरा तो आंख दिखाती।

गुस्से में थोड़ा गुर्राती।


शेर की मौसी कहलाती।

दूध मलाई चट कर जाती।।




मंजू यादव 

हरे, भरे होते हैं पेड़।

 









नव जीवन देते हैं पेड़।।

आस पास यदि पेड़ हमारे।।

तो हम जीवित रहेगें सारे।।

रंग बिरंगे फूल हैं पाते।।

देते फल जो,

हम हैं खाते।।

पेड़ों से मिलती हरियाली।।

पंछी बैठे डाली ,  डाली।।


पेड़ों से अस्तित्व हमारा।।

यदि  पेड़ नहीं, तो सूना जग सारा।।

मंजू यादवहरे, भरे होते हैं पेड़।

नव जीवन देते हैं पेड़।।

आस पास यदि पेड़ हमारे।।

तो हम जीवित रहेगें सारे।।

रंग बिरंगे फूल हैं पाते।।

देते फल जो,

हम हैं खाते।।

पेड़ों से मिलती हरियाली।।

पंछी बैठे डाली , डाली।।


पेड़ों से अस्तित्व हमारा।।

यदि पेड़ नहीं, तो सूना जग सारा।।


मंजू यादव