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सोमवार, 1 मई 2017

सियाराम शर्मा की कहानी : अक्षय घट




                       अक्षय घट


 एक नगर में  चंदर नाम का लड़का अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहता था । गरीब होने के कारण बह बहुत दुखी रहता, पर आलस के कारण कोई भी मेेहनत का काम नहीं करना चाहता था । माँ हमेशा उसे समझाती की वह हाथ  पर हाथ धरे 'क्यों  बैठा रहता है?  कोई काम करने की कोशिश क्यों नहीं करता । वह बस अपने भाग्य को कोसता कि मुझे ऐसे घर में क्यों जन्म दिया जहाँ जीवन की कोई सुख -सुविधा नहीं है ।

एक दिन दुखी होकर उसने  अपना जीवन समाप्त करने की सोची । वह घर से बहुत दूर निकल गया, चलते चलते एक आश्रम के पास पहुँच कर रूक गया । भूख के मारे 'पेट में चूहे कूद रहे थे !' वह बेहाल होकर गिर गया । निरंजनी साधु ' चरण दास ' जी उस स्थान पर साधना करते थे । उन्होंने उसे बेसुध देख कर उठाया, और अपने आश्रम में रहने की जगह दी । उसकी सारी कहानी सुन कर उन्होंने कहा, 'अरे!  मूर्ख,  मरना तो बड़ा आसान है, पर जीना ही तो सबसे बड़ी तपस्या है । जीवन परमात्मा का उपहार है, इसे नष्ट करना सबसे बड़ा पाप है  ।' उस लड़के ने कहा कि मैं अपनी माँ को कुछ भी सुख नहीं दे पाया हूं, अब मुझसे यह सब सहा नहीं जाता । इसलिए में अपना जीवन खत्म करना चाहता हूँ ।
   साधु ने उसे समझाते हुए कहा कि "ठीक है, मेरे पास एक ऐसा  'घट ' है जो इंसान की सब जरूरत पूरी कर देता है!  पर यदि बह टूट-फूट जाए बह जो उससे मिला है वह सब भी  खत्म हो जाएगा । मैंने इस घड़े को बनाने की विद्या अपने गुरूजी की  सेवा से पायी है । तुम्हें मेरे पास  कुछ दिन रहकर सेवाएं देनी होंगी ।
अगर   तुम मेरे पास रहो तो  में तुम्हें "अक्षय घट " बनाने की कला भी   सिखा दूंगा!  पर इसके लिए तुम्हें यहाँ पाँच साल रहना होगा ।

  लड़के ने कहा कि मुझे तो आप वह 'अक्षय घट' ही दे दें । में  बहुत  सम्हाल कर रखूंगा । जरा भी  ठेस नहीं  लगने  पायेगी ।  कुछ समय के बाद वह "घट " लेकर लौटा!
अब तो  कुछ दिनों में ही उसके सब साधन आगये । जो चाहिए वह घट से माँग लेता । धीरे -धीरे उसका आलस्य बढ़ता ही गया । "अक्षय घट " को बहुत सम्हाल कर रखता । धीरे -धीरे  विलासी हो गया । सभी दुर्गुणों में डूबता गया । एक दिन  नशे में ठोकर खाकर खुद "अक्षय घट"पर गिर गया । गिरते ही घट के टुकडे -टुकड़े हो गए । उसके साथ ही  जादुई दुनिया भी गायब हो गई ।
अब  तो वह बहुत पछताया कि काश मैं  "घट बनाने का कौशल सीख लेता तो  ,आज में इतना बेकार नहीं रहता । "
जीवन में विद्या एवं कौशल का महत्व उसे समझ आचुका था ।

                         सियाराम शर्मा
                         डीडवाना
                         जिला  नागौर
                         राजस्थान


बुधवार, 26 अप्रैल 2017

शरद कुमार श्रीवास्तव की रचना : बन्दर मामा की बारात





बन्दर मामा की शादी

बन्दर मामा पहन सूट वे निकले ले बारात
हाथी घोडा बैन्ड बाजा सब थे उनके साथ
सब बन्दर नाचते गाते बहुत हो गई थी रात
दूल्हन के घर जा पहुँचे भइया लेकर बारात

दूल्हन देख ललचाऐ मामा खम्बा देख न पाये
अपने बूट मे फँसे बिचारे गिरे वहीं छितराय
दूल्हन ने जो देखा मामा को रही जरा चकराय
गालो मे पालिश ,कमर मे टाई, शादी कौन रचाऐ


                                  शरद  कुमार  श्रीवास्तव  

 गुंजिका कौशिक का बालगीत : बेटियाँ




बेटियाँ 

फूलों की तरह खिलती है।
जीवन में अनेक रंग भर देती है।
खुद एहसास नहीं किया मैंने ,
पर पापा कहते है कि बेटियाँ ऐसी ही होती है। 
प्यार भरा तोहफा होती हैं

हमारी जिंदगी की माला का सबसे प्यारा मोती हैं ,
एक नई दुनिया बसा देती है अपने आस पास ,
कहते है बेटियाँ ऐसी ही होती है।  
माँ की खुशियों की तिजोरी होती है।

पापा की राजकुमारी होती है। ,
पूरे परिवार को अपना बना लेती है। ,
बेटी नन्ही परी कहलाती है।
बेटों से प्यारी होती है बेटियाँ 
सबकी दुलारी होती है बेटियाँ ,
दिल में घर बना लेती हैं ,
ऐसी ही होती  है  बेटियाँ।

                        गुंजिका कौशिक
                       कक्षा नौ ( ब)
                       एमिटी इन्टरनेशनल स्कूल
                        गुरुग्राम




अंजू निगम की कहानी :



मौली एक  बहुत प्यारी बच्ची हैं| गोल-मटोल गुड़िया की तरह,जो  उसे देखता खुब स्नेह बरसाता| 
  अपने मम्मी-पापा की इकलौती बिटिया| लाड़-प्यार तो खूब मिलता हैं पर वो निहायत अकेली हैं|
  पापा ही ज्यादातर उसे संभालते| मम्मी तो किसी बहुत ऊँचे पद पर काम करती हैं| घर पर भी रहती तब भी उन्हें मौली से ज्यादा मतलब नहीं रहता बस जरा सा दुलार कर लेती| घर पर मम्मी या तो टी़वी से चिपकी रहती  या मोबॉइल से| पापा ही उसे बहलाते थे |
     अक्सर उसकी देखभाल के लिये दादी, मौसी या नानी आ जाते| वे सब उसे खूब  प्यार करते| पर माँ का प्यार तो फिर भी नहीं मिलता|
    मौली चाहती कि और बच्चोंबगगग की मम्मी की तरह उसकी मम्मी भी उसके लिये मजेदार टिफिन बना कर दे| पर माँ के पास तो टाइम नहीं था| न उसे खाना बनाने का कोई शौक था|
    जब खाना पकाने वाली नहीं आती तो होटल से खाना आ जाता| मौली चुप सी रहने लगी थी| ये बात दादी ने समझ ली थी| उन्होनें मौली की मम्मी को कहा भी| पर उन्हें तो अपनी नौकरी प्यारी थी| उन्होनें यहाँ-वहाँ की बात बनाकर बात को वही  खत्म कर दिया|
   उस दिन मौली का रिर्पोट-कार्ड आया| मौली के मम्मी -पापा को स्कूल बुलाया गया था| मौली पढ़ाई में पिछड़ रही थी| कोई प्रश्न पूछने पर उसका उत्तर भी नहीं देती| अक्सर गुमसुम सी एक जगह बैठी रहती|
  मौली के पापा को मामले की गंभीरता समझ आयी| प्यार से मौली से बात की|
"उसी को नौकरी करने वाली मम्मी क्यों मिली?और सहेलियों की मम्मी की तरह उसकी मम्मी क्यों नहीं बढ़िया टिफिन बना कर उसे दे पाती?" कह कर मौली खूब रोयी|
    उस दिन के बाद से मौली की मम्मी ने मौली पर ध्यान देना शुरु कर दिया| सुबह जल्दी उठ कर वे मौली का टिफिन बनाती| मौली के पापा उनकी मदद करते| क्योकिं मौली की मम्मी को तो ज्यादा कुछ बनाना आता ही नहीं था| धीरे-धीरे वे अच्छा खाना बनाना सीख गयी|
     आज मौली बहूत खुश हैं| बच्चों की मम्मी की कुकिंग प्रतियोगिता में मौली की मम्मी को प्रथम पुरस्कार जो मिला हैं|


                               अंजू निगम
                                इंदौर 

प्रिया देवांगन का बालगीत : गर्मी की छुट्टी





स्कूल की अब हो गई छुट्टी 

धमा चौकड़ी मचा रहे हैं ।

दिन भर नाचे कूदे बच्चे 

मम्मी पापा को सता रहे हैं ।


नहीं सोते दोपहर में भी 

टी वी मोबाइल चला रहे हैं ।

तेज आवाज में गाना बजाकर 

हो हल्ला मचा रहे हैं ।


आइसक्रीम वाले आते ही

दौड़ के सब जा रहे हैं ।

रंग बिरंगे फ्लेवर लेकर 

बड़े मजे से खा रहे हैं ।

 


प्रिया देवांगन "प्रियू" 

गोपीबंद पारा पंडरिया 

जिला -- कबीरधाम  ( छ ग )

Email --priyadewangan1997@gmail.com




( नन्हीं चिंड़िया)

नन्हीं चिंडिया मां से बोली,
मां मुझको भी सिखलाओ,
करूं सैर मैं दुनियां की भी,
दूर गगन में भी उड़ जाऊं,
मां बोली अभी हो तुम नन्हीं ,
पंख जरा तुम उग आने दो,
लाई मैं दाना दूर दूर से ,
चुन चुन दाना तुम खाओ,
नन्हीं चिंडिया मां से बोली,
मां मुझको भी सिखलाओ,.....
उगने लगे जब पंख देखकर,
नन्हीं चिडिंया फिर से बोली,
दाना चुनने चलूं साथ मैं,
साहस भी मैं  दिखलाऊं,
फुदक फुदक लगी झूमने,
लगी खुशी से भी उड़ने,
नन्हें पखों को फैलाकर,
चली सैर गगन की करने,
दाना चुनने लगी है चिड़िया,
मां बोली अब उड़ जाओ,
नन्हीं चिंडिया मां से बोली,
मां मुझको भी सिखलाओ,


                             भुवन बिष्ट
                              रानीखेत (उत्तराखण्ड)



दादा की टोपी
  

       सरर - सरर हवा चली,
       बात थी अनोखी।
       मेले में दादा की,
       उडी नई टोपी।

        चिनियां को साथ लिये,
         दादाजी भागे।
         दौड़ रहे पीछे वे,
         टोपी थी आगे।
         आई हंसी दादी को,
         मुश्किल से रोकी।

         टोपी यह ढीली सी,
         पापा क्यों लाये।
         दादाजी अम्मा पर ,
         जी भर चिल्लाये।
         गलती यह सब की सब,
         पापा पर थोपी।

          दादी को अम्मा को,
          जी भर फटकारा।
          पापा के पास नहीं,
          कोई था चारा।
          कहते हैं घर भर की
         अक्ल बहुत मोटी।


प्रभुदयाल श्रीवास्तव
               12, शिवम सुन्दरम  नगर छिन्दवाड़ा 
                मध्य  प्रदेश 

डॉ प्रभास्क पाठक का बालगीत : गीत बन जाता







सुनी कहानी नानी से 
दादी ने गीत सुनाया,
माँ की लोरी सुनकर ही
आँखों ने नींद चुराया  !
रोज सबेरे दादा जी 
सुंदर श्लोक सुनाते,
खा-पीकर अपने कंधे
नित खलिहान धुमाते !


पशु-पक्षियों,फूलों से 
परिचय होता रोज ,
बादल,बिजली,तारे देखा
करता नूतन खोज !
कभी सोचता पक्षी बन
करूँ हवा की सैर,
कभी सोचता फूल बनूँ
महकूँ जग में बिन वैर !
दादा-दादी ,नाना-नानी
बनते जाते एक कहानी,
मैं बन जाता गीत कहीं तो
चमन रचाता फिर मधुवाणी !

                              डॉ प्रभास्क पाठक 
                              रांची  झारखंड 

ठंडा है मटके का पानी (बाल कविता) सुशील कुमार शर्मा



गरम धूप में शोर मचाएं
मुन्नू टिल्लू रोते आएं
माँ नानी उनको पुचकारे
जोर जोर से हंसती रानी
ठंडा है मटके का पानी

गई परीक्षा गर्मी आई
नानी ने मंगवाई मिठाई।
धमा चौकड़ी करते भाई।
नानी की न कोई सानी
ठंडा है मटके का पानी।

पुस्तक कापी कौन पढ़े अब।
बच्चों के पीछे हैं पड़े सब।
मौका ऐसा किसे मिले कब।
अब तो छुक छुक रेल चलानी।
ठंडा है मटके का पानी।

शहर छोड़ नानी घर आये।
कूद नदी में खूब नहाए।
पत्थर मार आम गिराए।
नानी से सब सुनी कहानी।
ठंडा है मटके का पानी।

नानी का घर स्वर्ग के जैसा
मिलती मस्ती मिलता पैसा
नाना है तो अब डर कैसा।
नानी जैसा न कोई दानी।
ठंडा है मटके का पानी

                       सुशील शर्मा

अर्पिता अवस्थी की रचना :4: लोमड़ी की चतुराई


 

एक जंगल मे गोपू नामक शेर रहता था.
बहुत दिन बीते राज करते करते और बाकी जानवरो को डराते डराते पर अब जब वो बूढ़ा होगया तो कोई उसकी नही सुनता था यहां तक कि छोटे- छोटे खरगोश और चूहे भी नही,  एक दिन गोपू ने सारे जानवरो को सबक सिखाने के लिये  एक तरकीब सोची  उसने दावत का लालच देकर जंगल के सारे लोगो को बुलाया. अच्छा -अच्छा खाने के लालच मे सब उसकी सभा मे पहुंच गये लेकिन लोमड़ी जानती थी जब राजा के पास खाने के लिये नही है तो दावत क्या देगा? जरुर कुछ दाल मे काला है,  लोमड़ी सही थी  दरसअल शेर ने दूसरे जंगल के शेरो को न्यौता दिया था, वहां आये कुछ जानवरो का गोपू ने साथियो की मदद से भक्षण कर लिया.  फिर भी लोमड़ी शेरो की दावत मे पहंच गई और मुस्कुरा कर शेर के सामने आई और बोली "श्रीमान आप  जल्दी से मुझे खा लीजिये" उसकी बात सुन कर गोपू और बाकी शेर चकित रह गये फिर गोपू ने पूछा "सभी भय से कांपते हुऐ प्रार्थना कर रहे है कि मुझे मत खाओ और तू  ऐसा कह रही है, माजरा क्या?" लोमड़ी ने बड़ी विनम्रता से कहा  "श्रीमान दरसअल बहुत से शिकारी बन्दूक लेकर यहीं आरहे है हम सबको पकड़ कर सरकस मे नाच नचाने के लिये, सरकस मे गुलाम बन कर तमाशा करने से अच्छा है कि मै जंगल के र‍ाजा का भोजन बन जाऊ." शिकारियो का नाम सुनते ही सभी शेर अपने - अपने जंगल की तरफ भाग गये. 
बेचारे गोपू का मुंह देखने लायक था जब
लोमड़ी हंस पड़ी क्योकि वहां कोई शिकारी नही आया, जान बचती देख कर सभी जानवर लोमड़ी की बुध्दिमत्ता से  प्रसन्न हुऐ और उसे जंगल की रानी बना दिया 

                     अर्पिता  अवस्थी
                     बर्रा  कानपुर 
                     raressrare@gmail.com