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रविवार, 6 अगस्त 2017

शरद कुमार श्रीवास्तव की रचना : पंचतंत्र की एक कहानी पर आधारित : चार मित्र




चार मित्र गुरूकुल से  पाकर शिक्षा  घर प्रस्थान किये
राह में वे अपनी विद्या का बढचढ़ खूब बखान किये
उन लोगों को तभी राह मे हड्डियों का एक ढेर मिला
कौन तेज है अपनी विद्या मे समझाने का मिला सिला

एक बोला हड्डियों से मै शेर का कंकाल बना सकता हूँ
दूसरा बोला मै भी उस पर माँस खाल चढ़ा सकता हूँ
तीसरा दोस्त उस शेर को जीवित करना बता रहा था
चौथे मित्र का मन काम का परिणाम बोध करा रहा था

चौथा मित्र संकोच सहित बोला था वो सबसे जाकर
करो स्वयं सुरक्षा भाई कहता हूँ सबसे शीश नवाकर
कंकाल बना लो, चाहे तो हड्डी पे भी माँसचर्म मढ़ालो
जान डालने से पहले स्वयं खुद अपने को तो बचालो

मित्रो ने उपहास किया बोले हम निडर पर तू कायर है
बना रहे हैं शेर पर तुझको जाने किससे लगता डर है
हमारा बनाया शेर देखना हमेशा हमारा कहना मानेगा
हम कहेगे बात कोई भी तो वह हर्गिज कभी न टालेगा

वे बोले तू कायर है तुझको विद्या कुछ नही आती है
हमारे अचम्भा दिखाने की बात इसीसे तुझे न सुहाती
तुम्हे लगता है अगर डर तो भाई पेड़ पर चढ़ जाओ
हम सबके प्रदर्शन के बीच दोस्त तुम टाँग न अड़ाओ

चौथा मित्र झट जा बैठा पेड़ पर अपनी जान बचाकर
पहले दो ने शेर बनाया ,उसको फूलो से खूब सजाकर
तीसरे ने जैसे ही जान डालने हित मन्त्रों की फुँकाई
शेर तुरंत जीवित होकर तीनो को वह खा गया भाई



                                                    शरद कुमार श्रीवास्तव

सियाराम शर्मा का राखी गीत




राखी
राखी
रेशम का धागा
हरे लाल पीले
मोती से पिरोए
नेह की डोर में
समाये
बहना के
असीम,
प्यार की उमंगों


उमड़ते हुए
अनुराग
स्नेह की
पावन
अटूट सौगात
भाई की
कलाई पर
बंधी यह
डोर!
आशाओं
आशीर्वादों की
कामनाओं से
पूरित
भाई के मस्तक पर
शोभित तिलक चंदन की
चमकती दमक
खुशियों की
अपार
मिठास
रिश्तों में
अतुल रस
घोलता
स्नेह उत्सव
रखे अमर
भाई -बहन
प्यार के
बंधन को  अटूट
यह रक्षाबंधन


                                  सियाराम शर्मा

अंजू निगम की बालकथा : ये दोस्ती



दीपा क्लास के दरवाजे पर इस तरह खडी हो गयी कि अवनि क्लास के अंदर नहीं आ पाये| जानबूझकर दीपा ऐसे काम करती जिससे अवनि को हैरान होना पड़े| अवनि जानती थी कि दीपा से कुछ भी कहना बेकार हैं |  इसलिये वो वापस पलट गयी|  पीछे जोरदार ठहाका लगा|  अवनि की आँखों मे नमी उतर आयी|
    एक समय था जब ये दोनों पक्की सहेलियाँ थी|  हर बात का साथ था दोनों का . पर आज केवल प्रतिद्वंद्वी|
उनका दोस्ताना देख कितनी कोशिश चलती थी कि इस दोस्ती मे दरार पड़ जाये| मालुम तो सबको ही था कि दीपा कान की कितनी कच्ची  हैं|अवनि  ही उसे संभाल रखती|
"पहले कही बात को परखो फिर विश्वास करो"कितनी बार तो अवनी ये बात दीपा के कानों मे डाल चुकी थी|उसे कहाँ पता था कि उसकी सीख ऐसे हवा मे उड़ जायेगी|
   दोनो पढ़ाई के साथ टेबल टेनिस मे भी माहिर थी| इस बार खिलाड़ियों का चयन  होना था|स्टेट लेवल पर|शुरुआती प्रतियोगिता मे ही दोनों आमने सामने थी|ये केवल इत्तेफाक था कि अवनि का लगाया जोरदार शॉट दीपा की उगलियों को चोटिल कर गया|इसी आधार पर उसे प्रतियोगिता से बाहर होना पड़ा|अवनि का चयन हो गया|

      वे लड़कियाँ ,जो जाने कबसे इसी मौके की तलाश मे थी,उनकी दोस्ती तोड़ने का सुनहरा मौका हाथ लगा|फिर जाने कितने अफसाने बने और अवनि के प्रति दीपा का मन खट्टा कर गये|अवनि की कोई सफाई काम न आई|दीपा की ये बेरूखी अवनि को तोड़ गयी|
   फिर वक्त ने कुछ ऐसी करवट ली|कि वार्षिक परीक्षा के लगभग दो महीने पहले दीपा बेतरह बीमार पड़ी|उसे मीयादी बुखार ने आ घेरा|उसकी पढाई ठप्प हो गई|वे चापलूस लड़कियाँ  हवा के झोंके की मानिंद गायब  होने लगी|
    अवनि ही रोज के नोटस् बना दीपा की मम्मी को दे आती| दीपा उसका लिखा पहचान न ले इसके लिए उसे अपने लिखे का तरीका बदलना पड़ा|
आंटी परख रही थी अवनि की दोस्ती|एक दिन आंटी ने ही बताया कि नोटस् मिलने के बाद भी दीपा उदास एवं  हताश हैं|तब अवनि ने दीपा से बात करने की सोची|पहल उसी को करनी पड़गी|वो नादान केवल मुँह फुलाना जानती हैं|

     अवनि के सामने आते ही मानो दीपा का इतने दिनो का बांधा गुस्सा निकल पड़ा|दीपा और खरी सुनाती अवनि को कि माँ आ गई|
"बस कर अवनि!!अपनी दोस्ती साबित करने के लिये और कितने इम्तिहान दोगी?ये नादान नहीं समझ पायेगी तुम्हारी दोस्ती को|"
 फिर माँ ने दीपा के बीमार होने से लेकर अब तक का सारा किस्सा बयान किया|
    दीपा हैरान थी,शर्मिंदा भी|उसकी आँखो मे आँसू तिर आये|अवनि ने उसे गले लगा लिया|इतने दिनो का बिछोह दोनों की आँखों से आँसू बन बह निकले|आंटी की आँखे भी नम थी|
   एक महीने के बाद दोनों एक साथ स्कूल पहुंची|वे चापलूस लड़कियां आँख चुराते इधर-उधर हो गयी|
       उनकी दोस्ती अग्नि परीक्षा से गुजर और खरी हो गयी थी|

                              अंजू निगम
                              इन्दौर 

बुधवार, 26 जुलाई 2017

बेबी वीनम नामा की अंग्रेजी  रचना। : My Mother







 




                            वीनम नामा

                            कक्षा  सात,

                           रुक्मणी  देवी  पब्लिक  स्कूल 

                           पीतमपुरा,  नई  दिल्ली  




चुटकुले : संकलन शरद कुमार श्रीवास्तव











1
. रामू (मैथ के सर से)- सर इंगलिश के सर अंग्रजी मे बात करते हैं आप क्या मैैथ मे बात नही कर सकते हैं?
मैथ के सर- रामू ज्यादा तीन पाँच नहीं करो, फौरन नौ दो ग्यारह हो जाओ वरना कान के नीचे पाँच रसीद करूंगा कि छठी का दूध यादआ जायगा
2
कमरे मे मच्छर काट रहे थे मम्मी ने मच्छरदानी लगा कर लाइट बुझा दिया. एक जुगनू किसी तरह मच्छरदानी मे घुस आया तो आशी बोली मम्मी मच्छर यहाँ हमे टार्च लेकर ढूढने आया है़
3
बच्चो को पढाने के लिए रखे जाने वाले टीचरों का इन्टरव्यू चल रहा था एक प्रत्याशी से पूछा गया बच्चों के साथ का आपको क्या अनुभव है ?
प्रत्याशी बोला, जी अच्छा अनुभव है ,कल तक मै भी बच्चा था.

4
शौर्य — सतीश तू हाथ में बर्फ लिए इतनी देर से क्या देख रहा है
सतीश — भाई मैं देख रहन हूँ यह लीक कहाँ से हो रही है।

5
अजय : यार जय कार धीरे चलाओ मुझे डर लग रहा है
जय : डरने की कोई बात नहीं है तू भी आँख बंद कर ले जैसे मैं बंद किये हूँ

6
 अध्यापक : रमेश पानीपत , प्लासी या और किसी लड़ाई के बारे में तुम्हे क्या मालूम है

रमेश -पानीपत , प्लासी के बारे में मैं जानता नहीं मैं वहाँ नहीं था मम्मी पापा की लड़ाई के बारे में बाहर बताने मना किया है

                                संकलन
                                शरद  कुमार  श्रीवास्तव

महेंद्र देवांगन की छत्तीसगढ़ी भाषा में शिव भजन






बम बम भोले 
***************
हर हर बम बम भोलेनाथ के  ,  जयकारा लगावत हे ।
कांवर धर के कांवरिया मन , जल चढाय बर जावत हे ।
सावन महिना भोलेनाथ के, सब झन दरसन पावत हे ।
धुरिहा धुरिहा के सिव भक्त मन , दरस करे बर आवत हे ।
कोनों रेंगत कोनों गावत , कोनों घिसलत जावत हे ।
नइ रुके वो कोनों जगा अब , भले छाला पर जावत हे ।
आनी बानी के फल फूल अऊ , नरियर भेला चढावत हे ।
दूध दही अऊ चंदन रोली , जल अभिसेक करावत हे ।
भोलेनाथ के महिमा भारी , सबझन माथ नवावत हे ।
औघड़ दानी सिव भोला के, सब कोई आसीस पावत हे ।

                      रचना 
                      महेन्द्र देवांगन माटी 
                      पंडरिया छत्तीसगढ़ 

शरद कुमार श्रीवास्तव की बालकथा : कौवे और मुर्गी की साझा  खेती



बच्चों आप जानते हो कि साझा काम किेंसे कहते हैं ?   जब दो या कई लोग मिल कर एक काम को करें तो साझा काम कहते है।   साझा काम मे पार्टनर लोगो को अपना अपना साझा लाभ / हानि भी मिलता है।   साझा  काम  करने  में  सफलता  तभी  मिलती  है  जब  सभी  हिस्सेदारों की मेहनत  बराबर  की  हो  और नियत साफ हो  ।   इसके  लिए  बच्चों  हम  आपको  कौवे  और मुर्गी  की साझा  खेती  की  कहानी  सुनाते  हैं 


एक बार एक पेड़ पर एक कौवा रहता था .  उस पेड़ के नीचे एक मुर्गी भी अपने बच्चों के साथरहती थी .  मुर्गी बहुत मेहनती थी और कौवा बहुत चालाक था.  कौवे ने एक बार मुर्गी से कहा ,बहन अगर हम साझा खेती करें तो कितना अच्छा हो.  मुर्गी ने कहा हाँ , मिलजुल कर काम करने मे क्या बुराई है मै तैयार हूँ.    कौवा बोला  मै थोड़ा व्यस्त  रहता हूँ जब कोई काम हो तब आप मुझे बुला लीजियेगा.

खेती करने के लिये जमीन की जुताई करने का समय आया .   मुर्गी ने आवाज लगाई आओ जमीन की जुताई करवाओ आकर.  कौवा बोला ‘ ऊँची डाल पर बैठे हैं हलवा पूड़ी खाते है तुम चलो हम आते हैं। मुर्गी ने खेतों की जुताई कर ली।

जब जमीन से घास पूस दूर करने का समय आया .   मुर्गी ने आवाज लगाई आओ जमीन की खर पतवार हटवाओ ,   कौवा बोला ‘ ऊँची डाल पर बैठे हैं हलवा पूड़ी खाते है तुम चलो हम आते हैं ।   मुर्गी ने खेतों  से खर पतवार भी दूर कर दी.

अब खेत मे बीज डालने का समय आया .   मुर्गी ने आवाज लगाई आओ जमीन मे बीज डाले जायें.  कौवा फिर बोला ‘ ऊँची डाल पर बैठे हैं हलवा पूड़ी खाते है तुम चलो हम आते हैं।  मुर्गी ने खेतों मे बीज भी बो दिये.

पौधे निकल आये तब सिचाई करने का समय आया .   मुर्गी ने आवाज लगाई आओ जमीन की सिंचाई करवाओ आकर.  कौवा बोला ‘ ऊँची डाल पर बैठे हैं हलवा पूड़ी खाते है तुम चलो हम आते हैं ।    मुर्गी ने खेतों की सिंचाई कर ली.

खेतो मे लगे गेहूँ की बालियाँ  काटने का समय आया .   मुर्गी ने आवाज लगाई आओ गेहूँ कटवाओ . तब फिर कौवा बोला ‘ ऊँची डाल पर बैठे हैं हलवा पूड़ी खाते है तुम चलो हम आते हैं  ।  मुर्गी ने गेहूँ की कटाई भी कर ली

गेहूँ की बालियाँ  से गेहूँ निकालने का समय आया .   मुर्गी ने आवाज लगाई आओ गेहूँ निकलवाओ . तब फिर कौवा बोला ‘ ऊँची डाल पर बैठे हैं हलवा पूड़ी खाते है तुम चलो हम आते हैं ।   मुर्गी ने गेहूँ की बालियों से गेहूँ भी निकाल  लिया.

गेहूँ पीस कर आटा बनाने का समय आया .   मुर्गी ने आवाज लगाई आओ गेहूँ पिसवाओ . तब फिर कौवा बोला ‘ ऊँची डाल पर बैठे हैं हलवा पूड़ी खाते है तुम चलो हम आते हैं ।   मुर्गी ने गेहूँ पीस कर आटा भी बना लिया.

मुर्गी आटे से पूड़ी बनाने लगी तब फिर उसने आवाज लगाई आओ पूड़ी बनवाओ . तब फिर कौवा बोला ‘ ऊँची डाल पेंर बैठे हैं हलवा पूड़ी खाते है तुम चलो हम आते हैं ।   मुर्गी ने आटा सान कर पूड़ी भी बना ली

जैसे ही पहली पूडी कड़ाई से निकली कौवा नीचे आगया.  बोला लाओ पूड़ी लाओ बहुत भूख लगी है.  मुर्गी नपे एक डंन्डाफेक कर कौवे को मारा कि काम कुछ नहीं किया पूडी बटाने आ गया.   तुझे कुछ नहीं मिलेगा पूड़ी मैं खाऊंगी और मेरे बच्चे खाएगे ।   कौवा रोता हुआ वहाँ से भाग गया.

                            शरद कुमार श्रीवास्तव

अंकिता कुलश्रेष्ठ की कविता : बचपन प्यारा




""एक बार जो फिर मिल जाए
मुझको मेरा बचपन प्यारा
अपनी मुठ्ठी में भर लूँ में
नील गगन और चंदा तारा




रंग बिरंगी तितली फिर से
पकडूं में बगिया में जाकर
फूलों से दामन भर लूं और
रंग लूं अपना जीवन सारा

मुझको मेरा बचपन प्यारा

खट्ठी मीठी गोली चूरन
और ढेरों प्यारे गुब्बारे
माँ की गोदी में चढ़ जाऊं
बनकर सबका राजदुलारा

मुझको मेरा बचपन प्यारा

कितना सुख होता बचपन में
कौतूहल और खेल खिलौने
न चिंता न कोई डर था
पर अब है विपरीत नज़ारा

मुझको मेरा बचपन प्यारा



                            अंकिता कुलश्रेष्ठ


सुशील शर्मा की रचित क्रांतिकारी चन्द्रचन्द्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि

तीन  दिन  पूर्व  23 जुलाई  को  महान  क्रांतिकारी   चंद्रशेखर आज़ाद की जन्मतिथि थी इस अवसर  पर विशेष रूप से महान क्रान्तिकारी  को "नाना की  पिटारी" की भावभीनी  श्रद्धांजलि 



तुम आज़ाद थे आज़ाद हो आज़ाद रहोगे ।
भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे ।
मौत से आँखें मिला कर वह बात करता था।
अंगदी व्यक्तित्व पर जमाना नाज करता था।
असहयोग आंदोलन का वो प्रणेता था।
भारत की स्वतंत्रता का वो चितेरा था।
बापू से था प्रभावित पर रास्ता अलग था।
खौलता था खून अहिंसा से वो विलग था।
बचपन के पंद्रह कोड़े जो उसको पड़े थे।
आज उसके खून में वो शौर्य बन खड़े थे।
आज़ाद के तन पर कोड़े तड़ातड़ पड़ रहे थे।
जय भारती का उद्घोष चंदशेखर कर रहे थे।
हर एक घाव कोड़े का देता माँ भारती की दुहाई।
रक्तरंजित तन पर बलिदान की मेहँदी रचाई।
अहिंसा का पाठ उसको कभी न भाया।
खून के ही पथ पर उसने सुकून पाया।
उसकी शिराओं में दमकती थी जोशो जवानी।
युद्ध के भीषण कहर से लिखी थी उसने कहानी।
उसकी फितरत में नहीं थी प्रार्थनाएं।
उसके शब्दकोशों में नहीं थीं याचनाएं।
नहीं मंजूर था उसको गिड़गिड़ाना।
और शत्रु के पैर के नीचे तड़फड़ाना।
मन्त्र बलिदान का उसने चुना था।
गर्व से मस्तक उसका तना था।
क्रांति की ललकार को उसने आवाज़ दी थी।
स्वतंत्रता की आग को परवाज़ दी थी।
माँ भारती की लाज को वो पहरेदार था ।
भारत की स्वतंत्रता का वो पैरोकार था।
अल्फर्ड पार्क में लगी थी आज़ाद की मीटिंग।
किसी मुखबिर ने कर दी देश से चीटिंग।
नॉट बाबर ने घेरा और पूछा कौन हो तुम।
गोली से दिया जबाब तुम्हारे बाप हैं हम।
सभी साथियों को भगा कर रह गया अकेला।
उस तरफ लगा था बन्दूक लिए शत्रुओं का मेला।
सिर्फ एक गोली बची थी भाग किसने था मेटा ।
आखरी दम तक लड़ा वो माँ भारती का था बेटा।
रखी कनपटी पर पिस्तौल और दाग दी गोली।
माँ भारती के लाल ने खेल ली खुद खून की होली।
तुम आज़ाद थे आज़ाद हो आज़ाद रहोगे ।
भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे ।

                                                    सुशील  शर्मा 

मंजू श्रीवास्तव का बालगीत : वृक्षारोपण





      लाल, गुलाबी, नीले, पीले,

      तरह तरह के फूल रंगीले,
      
       मुन्नी, चुन्नी जल्दी आओ,

       चिंटू, पिंटू छैल छबीले,

      बगिया की रौनक तो देखो

       दुल्हन जैसी सजी हुई है





    
  बेला, चमेली, रात की रानी,

      महक उठी बगिया रानी।

     आओ अब हम पेड़ लगायें,

       आम, अमरूद,जामुन ,लीची

       कल ये पेड़ बड़े होंगे,

      मीठे फलों से लदे होंगे,

    


                              मंजू श्रीवास्तव 
                              ५०२ प्रांगण अपार्टमेंट 
                              सेक्टर ६२ नोएडा।