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गुरुवार, 26 जुलाई 2018

अर्चना सिंह जया की रचना : बच्चों मोबाइल छोडो









बच्चों! मोबाइल को छोड़ो,

बचपन में नए रंग बिखेरो,

खुशियों को करीब से जानो।

उछलो कूदो, दौड़ो भागो

दोस्तों के संग गेंद खेलो।

मिल जुल कर रेल बनाओ,

इंजन-बोगी तुम ही बन जाओ।

बचपन में चलो रंग बिखेरो।

कागज की नाव बनाकर,

ठहरे पानी में तैराओ।

मित्रों के संग पतंग उड़ा,

कटी पतंग लूटकर लाओ।

बल्ले-गेंद से क्रिकेट खेल,

कपड़े व तन पर दाग लगाओ।

बचपन में नए रंग बिखेरो।

अपनी माता समान भूमि पर,

रंगीन कंचों का आनंद उठाओ।

कोरे कागज़ पर चित्र बना,

मन चाहे रंग से रंग डालो।

चार सखा के साथ बैठ,

लूडो-कैरम में मन रमा लो।

फुटबाल,हाॅकी या हो बैडंिमंटन,

मैदान में अपने दम दिखा दो।

बचपन में नए रंग बिखेर कर,

खुशियों को करीब से जानो।





        अर्चना सिंह ‘जया‘

डॉक्टर प्रदीप शुक्ल की नई रचना। : ओ आर एस का घोल



भोलू भालू कल सन्डे को
गया घूमने हाट
और किनारे वहीं सड़क पर
उसने खाई चाट

दो दर्जन पानी पूरी भी
कल उसने थे गटके
ऊपर से फिर दो दो पत्तल
दही बड़े भी सटके

आज सुबह बिस्तर से उठकर
हुई अचानक उल्टी
बिस्तर पर ले रहा दर्द से
भोलू अल्टी पल्टी

दस्त शुरू हो गए दनादन
भोलू जी घबराए
भोलू की मम्मी दौड़ें, कुछ
उन्हें समझ ना आए

फोन लगाया डॉक्टर को
तो उसने तुरत बताया
ओ आर एस का घोल पिलाओ
शाम तलक मैं आया

घर में अभी नहीं ओ आर एस
मम्मी भी घबराई
तभी पड़ोसी रुनझुन बन्दर
दौड़ी भागी आई

कहा, अरे! तुम भोलू दादा
बिल्कुल मत घबराना
नमक और चीनी से मुझको
आता घोल बनाना

तब तक इसको पियो ज़रा तुम
मैं जाती बाजार
अभी दौड़ ओ आर एस के
पैकेट लाती हूँ चार

ग्लास भरा गोलू ने पूरा
गट गट सब पी डाला
पर तुरंत ही उल्टी में फिर
सारा घोल निकाला

सुस्त हो गया अब तक भोलू
लेटा हुआ निढाल
घबराई मम्मी की हालत
हुई हाल बेहाल

तब तक रुनझुन ओ आर एस के
पैकेट लेकर आई
छोटा पैकेट एक ग्लास में
डाल तुरत वह लाई

दो दो चम्मच पानी,
हर दो मिनट में उसे पिलाया
हुई नहीं उल्टी भोलू को
अब जाकर मुस्काया

सूझबूझ से रुनझुन ने
भोलू की जान बचाई
सुनो, दस्त में ओ आर एस है
सबसे बड़ी दवाई.🐻



















डॉ  प्रदीप शुक्ल

स्वच्छता अभियान : मंजू श्रीवास्तव की बाल रचना







आओ बच्चों हम सब मिलकर,
स्वच्छता अभियान को सफल बनायें 
इधर उधर न कूड़ा फेंके,
स्वच्छता का सुन्दर पाठ पढ़ायें |

अधिक से अधिक पेड़ लगा कर,
पर्यावरण को शुद्ध बनायें |

रंग बिरंगे फूलों के पौधों से
शहर को अपने खूब सजायें |

चारों ओर हरियाली ही हरियाली,
प्रदूषण का नामों निशां मिटायें |

शुद्ध वायु हो,  शुद्ध वातावरण हो,
धरती को प्रदूषण मुक्त करायें |

कितना सुन्दर, कितना प्यारा
प्रदूषण मुक्त ये शहर हमारा |

स्वच्छ हो धरती, स्वस्थ हो मानव
स्वच्छता ही हो ध्येय हमारा |



















मंजू श्रीवास्तव हरिद्वार

गुलगुला : सपना मांगलिक का बालगीत






गोल गोल सा फूला फूला


गरम गुलगुला कहाँ चला?


अरे रेरे ,भई अरे रेरे


डूबा यह तो पेट कुआँ


हुई नाक फिर लाल लाल


मुंह से भी निकला धुंआ ।











सपना माँगलिक
आगरा 


प्रिया देवांगन "प्रियू" की रचना : रेल








छुक छुक करती आती रेल ,

छुक छुक करती जाती रेल ।

चिंटू पिंटू मोनू सोनू 

दौड़ लगाये खेले खेल ।


पटरी पर है चलती रेल ,

यात्रियों को भरती रेल ।

इस शहर से उस शहर तक ,

सबको भर ले जाती रेल ।


सौ सौ डिब्बों वाली रेल ,

कभी ना रहती खाली रेल ।

दौड़ लगाती खूब तेजी से, 

जल्दी से पहुँचाती रेल ।


साफ सुथरा अब रहती रेल ,

पंखा  एसी चलती रेल ।

कचरा फेंके जो डिब्बे में, 

उसको तो पहुँचाती जेल ।


चुन्नू मुन्नू चढ़े रेल ,

दिनभर खेले अपना खेल ।

यात्रियों का पेलम पेल ,

एक दूजे से होये मेल ।


 


                           प्रिया देवांगन "प्रियू"

                          पंडरिया  (कबीरधाम )

                          छत्तीसगढ़ 




संकल्प  (बाल लघुकथा ) : सुशील शर्मा 



आज विद्यालय में पोधरोपण हो रहा था सभी बच्चे बड़े उत्साह से स्कूल में उछल कूद कर रहे थे। बड़े बच्चे गड्ढा खोद रहे थे छोटे बच्चे गड्ढों के पास पानी और खाद बगैरह का इंतजाम कर रहे थे। मास्टरजी सबको ताकीद कर रहे थे की पौधों को कैसे रोपित करना है। 

'सुनील गड्ढा जरा नाप का खोदो देखो तुम तिरछा खोद रहे हो " मास्टरजी ने सुनील को निर्देशित किया। 

'जी सर " सुनील अलर्ट हो कर गड्ढा सीधा करने लगा 

"सवि तुम वो गोबर की खाद लेकर आओ " मास्टरजी ने कहा। 

"जी सर "सवि पॉलिथीन में राखी गोबर की खाद उठा लाई। 

"सर हम पौधों में खाद क्यों डालते हैं "सवि ने बड़ी सहजता से पुछा। 

"तुम खाना क्यों खाती हो ?"मास्टरजी ने मुस्कुराते हुए सवि से पूछा। 

"खाने से हमें ताकत आती है " सोहन बीच में ही बोल पड़ा। 

"लेकिन खाद तो खाना नहीं है ये तो गन्दा गोबर है "सवी ने फिर प्रश्न किया। 

"पेड़ पौधे ऐसी ही सदी गली चीजों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं " मास्टरजी ने सभी बच्चों को समझाया। 

"पेड़ पौधों में यह शक्ति होती है की वो सदी गली चीजों को अच्छी ऊर्जा में बदल देते हैं जैसे वो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण कर उसे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ऑक्सीजन में बदलते हैं और अपना भोजन बनाते हैं। "मास्टरजी ने सभी छात्रों को समझाया फिर एक प्रश्न किया "अच्छा बताओ बच्चो इस प्रक्रिया को क्या कहते हैं ?

सवि झट से बोली "सर इस प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं "

"बहुत सुंदर सवि ,अब तुम सब बच्चों को पता चला की अगर पेड़ पौधे भी ऑक्सीजन बनाना छोड़ दें तो क्या होगा " मास्टरजी ने बच्चों की और प्रश्नवाचक दृष्टी से देखा। 

"ऑक्सीजन जल्दी ख़त्म हो जाएगी और हम मर जायेंगे " सुनील ने झट से उत्तर दिया। 

"ऑक्सीजन बनती रहे इसके लिए हमें क्या करना होगा ?"मास्टरजी ने फिर प्रश्न किया। 

हमें बहुत सारे ,इतने सारे पौधे लगाने पड़ेंगे "नन्ही ऋतू ने अपनी दोनों बाहें फैलाकर बताया। 

"हमें इतने सारे पौधे लगाकर उन्हें बड़ा करना होगा ताकि हमें ज्यादा ऑक्सीजन मिले" सवि ने ऋतू की बात को और विस्तृत किया। 

आओ हम सब मिलकर नन्हे नन्हे पौधे रोपें और उन्हें पेड़ बनाने का संकल्प लें "मास्टरजी ने नन्ही ऋतू के हाथ में पौधा थमाते हुए कहा।  

सभी बच्चे जोर से चिल्लाये "हम सभी संकल्प लेते हैं "




                              सुशील   शर्मा 

सोमवार, 16 जुलाई 2018

कृष्ण कुमार वर्मा की कहानी *साँप और आरी*


एक दिन, एक साँप, एक बढ़ई की औजारों वाली बोरी में घुस गया।
घुसते समय, बोरी में रखी हुई बढ़ई की आरी उसके शरीर में चुभ गई और उसमें घाव हो गया, जिस से उसे दर्द होने लगा और वह विचलित हो उठा। गुस्से में उसने, उस आरी को अपने दोनों जबड़ों में जोर से दबा दिया।
अब उसके मुख में भी घाव हो गया और खून निकलने लगा। अब इस दर्द से परेशान हो कर, उस आरी को सबक सिखाने के लिए, अपने पूरे शरीर को उस साँप ने उस आरी के ऊपर लपेट लिया और पूरी ताकत के साथ उसको जकड़ लिया। इस से उस साँप का सारा शरीर जगह जगह से कट गया और वह मर गया।
      *ठीक इसी प्रकार कई बार, हम तनिक सा आहत होने पर आवेश में आकर सामने वाले को सबक सिखाने के लिए, अपने आप को अत्यधिक नुकसान पहुंचा देतें हैं।*
         *यह जरूरी नहीं कि हमें हर बात की प्रतिक्रिया देनी है, हमें दूसरों की गल्तियों को नजरअंदाज करते हुए, अपने परम पथ पर अग्रसर होना है और यह नहीं कि दूसरे को उसकी गलती की सजा देने के लिए हम अपने लक्ष्य और पथ से विचलित हो जायें।



                           कृष्ण कुमार वर्मा

शैलेंद्र तिवारी की रचना : स्मृति सनबर्ड




स्मति सनबर्ड
09 अप्रैल, 2018 नौ बजे कार्यालय जाने के लिये मैने अपनी कार के शीशे की सफाई करने के लिये जैसे ही अगला दरवाजा खोला अचानक एक चिड़िया उसके अन्दर आ गई। मैं ठीक से देख भी नहीं पाया कि वो अचानक उड़ते हुये पीछे की सीट व शीशे के गैप से होती हुयी डिक्की में चली गई। इसमे पहले ही वह दाई साइड की खिड़की से भी टकरायी थी। गरमी बढ़ने का समय हो रहा था। मैने डिक्की खोली तो एक कोने मेरे बैठी हुई एक सनबर्ड फिमेल दिखाई दी जो कि काफी डरी हुयी थी। मैने धीरे से कार की सीट पर पड़े तौलिये को उठाकर हाथ में लेकर उसे ढककर पकड़ा और अपने घर की पहली मंजिल पर लकर गया। तौलिये को खोलने के बाद जब मैने उसे पकड़ा तो वह आराम से मेरे हाथ पर बैठ गई लेकिन उसकी हृदय गति बहुत तेज थी।
मै अपनी स्मृति में पहले भी कह चुका हू कि मैं एक पक्षी प्रेमी व्यक्ति हू और मेरे पास कई लकड़ी के डिब्बे भी है।
क्योंकि मुझे कार्यालय को देर हो रही थी फिर भी मैने उसे एक सिरिंज में पानी व शहद भरकर थोड़ा सा पिलाया और एक लकड़ी के डिब्बे में बन्द करके मै कार्यालय को चला गया। शाम को कार्यालय से वापस आते ही सबसे पहले में अपनी घर की ममटी (वह स्थान जोकि सीढ़ियो से छत को जाने का रास्ता हो और छत से ठका हो) में गया डब्बा उठाया और पहली मंजिल के कमरे में गया वह स्वस्थ थी। मैं जानता था कि सनबर्ड फूलो से जूस (छमबजवत) चूसती हैं इस कारण मैने शहद की शीशी से 4 बूंद शहद लेकर एक सिरिंज में भरकर (पानी के साथ) उसे पिलाया और डब्बे में रखकर कमरे के अन्दर रख लिया। रात को खाना खा कर मै भी सो गया।
सुबह 5.00 बजे जब उठा तो बाहर हल्का-हल्का उजाला दिखायी दे रहा था। मुझे समय पर्याप्त नहीं लगा तो मैने 30 मिनट और इन्तजार किया उसके बाद जैसे ही मैने डिब्बा उठाया चिड़िया के फड़फड़ाने की आवाज मुझे सुनाई दी। मैने डिब्बे को खोला। डिब्बा खोलते ही वह पहले अन्दर को गई फिर शायद उसे यह अहसास हुआ कि यहॉ पर कोई खतरा नहीं है। यह सोचकर वह बाहर निकली और फुर्र से उड़कर मेरे घर के सामने लगे बोगेनवेलिया पर बैठ गई। लगभग 15 से 20 सेकेन्ड बैठने के बाद उसने एक बार मुड़कर देखा और फुर्र हो गई।
मेरा घर फूलो के पौधो से भरा हुआ था उसमें कई चिड़िया आती थी उसमें कई चिड़िया आती थी और आती है कई सनबर्ड भी आती थी और आती है पर मुझे लगता है कि शायद आज भी वह आती है। एैसा मुझे इसलिये लगता है कि पूर्व मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है।


                     शैलेन्द्र  तिवारी 
                     सेक्टर  21 इन्दिरा  नगर  
                     लखनऊ 

मंजू श्रीवास्तव की कहानी : प्रोफेसर नीरजा



प्रोफेसर नीरजा के कक्षा मे प्रवेश करते ही सभी छात्रों ने एक साथ नीरजा जी का स्वागत किया |
    नीरजा जी बहुत दिनों से छात्रों से कुछ कहना चाह रहीं थी उसका मौका आज मिल गया |
      नीरजा जी ने कहा बच्चों आज आपसे बहुत जरूरी बात करनी है इसलिये आज का पाठ कल  पढ़ाऊँगी | बच्चे खामोश हो गये |
       आज जे बात मैं बताने जा रही हूँ वो मेरे जीवन की सुन्दर सी कहानी है जिसे सुनकर आप भी प्रेरित होंगे |
      आज जिस मुकाम पर मैं हूँ उसके पीछे मेरी कड़ी मेहनत व मेरे माता पिता का बहुत बड़ा हाथ है |
      जब मैं बहुत छोटी थी तभी मेरे माता पिता का कार दुर्घटना मे देहान्त हो गया था  | बिल्कुल अकेली, असहाय सी अपने कमरे मे बैठी थी|
   तभी कमरे का दरवाजा खुला और अंकल आंटी आ गये जिनके यहां मेरी मां काम करती थी | उन्हें देखकर  मैं रोने लगी  | उन लेगों मुझे धीरज बंधाया और अपने घर ले गये |
अंकल आंटी निःसंतान थे | उन दोनो ने मुझे हमेशा के लिये अपने यहां रख लिया  अपनी बेटी बनाकर | मैने भी उन्हें मम्मी पापा कहना शुरू कर दिया  | स्कूल भी जाना शुरु कर दिया था |
        कुशाग्र बुद्धि तो थी ही मेरी |
     सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ते हुए १२ वीं मै टॉपर थी | सरकार की तरफ से मुझे स्कॉलरशिप मिली  | आगे की पढ़ाई जारी रखी |
    समय गुजरता गया | मैने ph.d की | माता पिता की खुशी का ठिकाना न था  |
      मैने प्रोफेसरशिप के लिये आवेदन पत्र भेजा और मेरा चयन हो गया  | 
    बच्चों  ये थी मेरे जीवन की सफलता की कहानी |
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बच्चों , सफलता उसीको मिलती है  जो मेहनत से पीछे नहीं हटते |
ईश्वर उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करते हैं   |


                            मंजू श्रीवास्तव हरिद्वार

प्रिया देवांगन "प्रियू" की रचना : बरसा रानी







बरसा रानी  बरसा रानी ,

जल्दी से तुम आओ ।

खेत सारे सूख गयें है ,

हरियाली तुम लाओ ।

सबको है इंतजार तुम्हारा ,

कब तक तुम आओगे ।

सबके मन में खुशियाँ ,

कब तक तुम लाओगे ।

जल्दी से तुम आ जाओ ,

इंतजार  मत कराओ ।

सूख रहे हैं कंठ हमारे ,

जल्दी प्यास बुझाओ  ।

जब तुम आओगी ,

चारों तरफ हरियाली होगी ,

सब किसानों के मन मे 

खुशहाली होगी।




                         प्रिया देवांगन "प्रियू"

                        पंडरिया  (कवर्धा )

                        छत्तीसगढ़