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गुरुवार, 26 जनवरी 2017

शादाब आलम का बालगीत : ओवर ईटिंग

ओवर ईटिंग बन्दर को जब भूख लगी तो जा पहुंचा मूली के खेत। इतना खाया, इतना खाया गुड़-गुड़-गुड़-गुड़ बोला पेट। तबियत उलझी, शुरू हुई फिर आनी उसको खूब डकार। ओवर ईटिंग ने कर डाला बन्दर भैया को बीमार शादाब आलम

डॉ प्रभास्क पाठक का बालगीत : ठंड






ठंड 

 कुनमुन करती सर्दी जाती
सूरज ने ओढ़ लिया रजाई,
शाम_सुबह की ठंडी ने भी
हालत पतली कर दी भाई ।




इस बसंत ने पहन रखे हैं
झूले फूलों से सजी सजाई,
दूबों ने मोती के मुकुट हैं धारे
ओस कणों ने दरबार लगाई ।

 रंग बिरंगी धरती पर अब
 गणतंत्र भर रही है अंगड़ाई, 
उधर भारती कर में लेकर
ज्ञान किरण की बीन बजाई ।


लुब्ध, बुद्ध औ' शुद्ध हो रही
जीव ,जड़ ,माया संग सींच,
लता,गुल्म, तृण-तृण में
सृष्टि ने अद्भूत रास रचाई ।


                            डॉ प्रभास्क पाठक  
                           राँची 
                           झारखंड 

शुरुआत : शरद कुमार श्रीवास्तव की बालकथा

शुरुआत :- आज लालबत्ती क्रोसिंग पर हमेशा की तरह रुकना पडा़ । अभी 26 जनवरी के झंडा आरोहण समारोह के बाद लौट ही रहा था कि इस क्रासिंग पर लालबत्ती जली हुई थी इसलिए मुझे अपनी गाड़ी रोकनी पडी । मेरी गाड़ी की खिड़की के सामने एक दस- ग्यारह साल का बच्चा कई सारे झंडों के साथ खड़ा हो गया । इस तरह के बच्चे अक्सर ही इन चौराहों पर दिखाई देते हैं पर हमेशा कोई विशेष ध्यान नही जाता था । पता नही आज गणतंत्र दिवस के दिन मैं क्यों विचलित हो गया । मैं कार में अकेला ही था । खिड़की खोलकर मैंने उन झंडों के दाम पूछे और उसके सारे , लगभग, पंद्रह बीस झंडे, उससे ले लिए । उस बालक को कौतूहल हुआ । उसने पूछा कि आप इतने सारे झंडों का क्या करेंगे? मैंने उसके प्रश्न का जवाब न देकर उससे पूछा कि तुम्हारे सारे झंडे बिक चुके हैं अब तुम क्या करोगे । उसने कहा कि बस अपने घर जाऊँगा । मैंने उस बच्चे से पूछा कि वह कहां रहता है । इसपर उसने पुल के नीचे एक स्थान दिखाकर कहा कि यही पास मे ही रहता हूँ । मैने कहा मै भी तुम्हारे घर चलूँगा । यह कहकर मैंने अपनी गाड़ी को पुल के नीचे ही एक साइड में खड़ी की और गाड़ी से झंडे लेकर उस बच्चे के साथ उसके घर की तरफ़ गया । उसका घर टाट की पुरानी बोरियों पालिथिन इत्यादि से बना छोटा टेन्टनुमा घर था । उस बच्चे ने मुझे बताया कि यही उसका घर है । बहुत दिनों से मैं चाहता था कि मै समाज का इनाम लोगों के जीवन को पास से देखूं और कुछ करूँ । आज का समय ठीक था । इन बच्चों को आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर इन बच्चों को गणतंत्र दिवस के बारे में जानकारी दूंगा और झंडा और टाफी के लिए पैसे बाँटूंगा । अतः मैंने समय का सदुपयोग करने के बारे मे सोंचा । उस बच्चे के साथ चलते हुए मैंने उससे उसका नाम पूछा । उसने मुझे नाम अपना नाम गुड्डू बताया । गुड्डू के साथ मुझे वहाँ आया देखकर वहां आसपास के कई बच्चे आ गए थे । । सभी बच्चों को मैंने एक अर्धचक्र में खड़ा किया । फिर मैंने उनसे पूछा कि आप जानते हैं कि आज 26 जनवरी है । सब बच्चे एक ही सुर में बोल उठे कि जी हाँ आज 26 जनवरी है । मैंने सब बच्चों को वे झंडे बांट दिया और फिर पूछा कि 26 जनवरी मे हम क्या करते हैं तथा यह क्यों मनाया जाता है । मेरे यह पूछने पर एक छोटी लड़की बोल पडी कि आज के दिन हम झंडा फहराते है । दिल्ली में राजपथ पर झंडा हमारे राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं, फिर वहाँ सेना की परेड होती है और अलग अलग राज्यों की झांकियां निकलती हैं । यह सुनकर मुझे अचम्भा हुआ कि इतना सब इस बच्चे को कैसे मालूम हुआ । कपड़ों और रहने के परिवेश से तो नहीं लगता है कि ये बच्चे स्कूल जाते होंगे । मैंने उससे पूछा कि आप को यह सब कैसे पता चला । उसी समय वहीं खड़ी एक स्त्री ने बताया कि शाम को एक भैया अपनी मोटरसाइकिल से आते हैं वही इन बच्चों को बैठाकर पढाई कराते हैं । उन्होंने ने ही सब बताया है । मगर पूछा कि उनको आप लोग कुछ पैसे देते होगे ? यह सुनकर वह बोली कि नहीं बाबू वे बहुत भले आदमी है । उन्होंने ही सभी बच्चों को कापियां पेंसिल किताबें भी लाकर दिया है । अब मैं अपने को बहुत छोटा महसूस कर रहा था कि इन बच्चों को महज एक झंडा पकड़ा कर और टाफी के लिए पैसे बाटकर मैं गौरांवित अनुभव कर रहा था कि मैं इन बच्चों की छोटी सी खुशी का हिस्सा बन रहा हूँ । लेकिन वह लड़का अपनी पढ़ाई से समय और पैसा निकाल कर इन बच्चों के सामाजिक उत्थान के लिए प्रयास रत है । यह एक छोटी सी शुरुआत ही सही पर बहुमूल्य प्रयास है और वह भी भी बिना किसी शोरशराबे के । निश्चय ही वह, इन गरीब बच्चों को समाज की मुख्यधारा में शामिल कराने के लिये सराहनीय योगदान देरहा है । उस स्त्री ने आगे बताया कि रविवार को उन बाबू के कुछ दोस्त लोग भी आते हैं जो इन्हें गाना बजाना भी सिखाते हैं । यह सुनकर मेरा सिर उन लोगों के लिए श्रद्धा से झुक गया कि हम सोचते ही रह गए और नई पीढ़ी के इन बच्चों ने इस नेक काम की शुरुआत भी कर दी है । शरद कुमार श्रीवास्तव

सुशील शर्मा जी की ओजस्वी कविता



माँ तेरे बेटे ने वक्षस्थल पर गोली खाई है*
(एक शहीद का अंतिम पत्र )


अपने शोणित से माँ ये अंतिम पत्र तुझे अर्पित है।
माँ भारती के चरणों में माँ ये शीश समर्पित है।
माँ रणभूमि में पुत्र ये तेरा आज खड़ा है।
शत्रु के सीने पर पैर जमा ये खूब लड़ा है।
कहा था एक दिन माँ तूने पीठ पे गोली मत खाना।
शत्रु दमन से पहले घर वापस मत आ जाना।
सौ शत्रुओं के सीने में मैंने गोली आज उतारी है।
माँ तेरे बेटे ने की शत्रु सिंहों की सवारी है।
भारत माँ की रक्षा कर तेरे दूध की लाज बचाई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

मातृभूमि की धूल लपेटे तेरा पुत्र शत्रु पर भारी है।
रक्त की होली खेल शत्रु की पूरी सेना मारी है।
वक्षस्थल मेरा छलनी है लहू लुहां में लेटा हूँ।
गर्व मुझे है माँ तुझ पर मैं सिंहनी का बेटा हूँ।
मत रोना तू मौत पे मेरी तू शेर की माई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।


पिता आज गर्वित होंगें अपने बेटे की गाथा पर।
रक्त तिलक जब देखेंगे वो अपने बेटे के माथे पर।
उनसे कहना मौत पे मेरी आँखें नम न हो पाएं।
स्मृत करके पुत्र की यादें आंसू पलक न ढलकाएं।
अब भी उनके चरणों में हूँ महज शरीर की विदाई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

उससे कहना धैर्य न खोये है नहीं अभागन वो ।
दे सिन्दूर माँ भारती को बनी है सदा सुहागन वो।
कहना उससे अश्रुसिंचित कर न आँख भिगोये वो।
अगले जनम में फिर मिलेंगें मेरी बाट संजोये वो।
श्रृंगारों के सावन में मिलेंगें जहाँ अमराई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

स्मृतियों के पदचाप अनुज मेरे अंतर में अंकित हैं।
स्नेहशिक्त तेरा चेहरा क्या देखूंगा मन शंकित है।
ह्रदय भले ही बिंधा है मेरा रुधिर मगर ये तेरा है।
अगले जनम तू होगा सहोदर पक्का वादा मेरा है।
तुम न रहोगे साथ में मेरे कैसी ये तन्हाई है।
माँ से कहना मैंने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

बहिन नहीं तू बेटी मेरी अब किस को राखी बांधेगी।
भैया भैया चिल्लाकर कैसे तू अब नाचेगी।
सोचा था काँधे पर डोली रख तेरी विदा कराऊंगा।
माथे तिलक लगा इस सावन राखी बँधवाऊंगा।
बहना तू बिलकुल मत रोना तू मेरे ह्रदय समाई है।
माँ से कहना मैंने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

पापा पापा कह कर जो मेरे काँधे चढ़ जाती थी।
प्यार भरी लोरी सुन कर वो गोदी में सो जाती थी।
कल जब तिरंगें में उसके पापा लिपटे आएंगे।
कहना उससे उसको पापा परियों के देश घुमाएंगे।
उसको सदा खुश रखना वो मेरी परछांई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

माँ भारती के भाल पर रक्त तिलक चढ़ाता हूँ।
अंतिम प्रणाम अब सबको महाप्रयाण पर जाता हूँ।
तेरी कोख से फिर जन्मूंगा ये अंतिम नहीं विदाई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

(सभी शहीदों को समर्पित )



                          सुशील  शर्मा 

शरद कुमार श्रीवास्तव का बालगीत भारत देश का झंडा : शरद कुमार श्रीवास्तव



खूब  सलोना  न्यारा  सा अपने  देश  का  झंडा 




खूब  सलोना न्यारा है  अपने  देश का झंडा।
बहुत  सुन्दर  प्यारा सा  भारत  देश का झंडा

रंग  केसरिया बतलाये हममें  कितना  बल है
श्वेत  रंग दर्शाता भारत  शांत सत्य  सरल है

बीच मे चक्र है बना हुआ चौबीस  तीली वाला
गतिशील, धर्म और जीवन  को  दर्शाने  वाला  ।

इसमे हरे रंग  की  पट्टी नीचे  की  ओर है लगाई
हमे मेरे  देश की  सोंधी मिट्टी  की  महक सुहाई।

पावन है यह धरती  अपनी सुन्दर नील गगन  है
तिरंगा जब लहराता  है  तब हर्षित  होता  मन है

खूब  सलोना न्यारा है  अपने  देश का झंडा।
बहुत  सुन्दर  प्यारा सा भारत  देश का झंडा ।।










शरद कुमार  श्रीवास्तव

प्रिया देवांगन "प्रियू" का बालगीत : वन्दे मातरम गाना है                       












वंदे मातरम गाना है 

छब्बीस जनवरी मनायेंगे,तिरंगा हम लहरायेंगे।

तीन रंग का हमारा तिरंगा,शान से हम फहरायेंगे।

इस झंडे को पाने खातिर,कितने जान गंवाये है।

वीर सपूत बलिदानी हो के,इसका मान बढ़ाये है।

वंदे मातरम का नारा लगाके,देश भर में फैलाना है।

वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम गाना है।



                             रचना 
                             प्रिया देवांगन "प्रियू" 
                             गोपीबंद पारा पंडरिया 
                              जिला -- कबीरधाम  ( छ ग )
                            Email --       priyadewangan1997@gmail.com

महेन्द्र देवांगन "माटी" का बालगीत : तीन रंगो का प्यारा झंडा


तीन रंगों का प्यारा झंडा 

तीन रंगों का प्यारा झंडा, शान से हम लहरायेंगे ।
कभी नही हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे ।
कोई दुश्मन आंख उठाये, उनसे न घबरायेंगे ।
जान की बाजी खेलकर अपनी, हम तो इसे बचायेंगे 

भारत मां के बेटे हैं हम , गीत प्यार के गायेंगे  
कभी नही हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे 
आंधी आये तूफां आये , रुक नही हम पायेंगे ।
दुश्मन की सीना को चीरकर, आगे आगे बढ़ते जायेंगे ।








है अपना ये प्यारा झंडा , चोटी पर लहरायेंगे ।
कभी नही हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे ।
भारत माता सबकी माता, सुंदर इसे बनायेंगे ।
भेदभाव हम नहीं करेंगे, सबको हम अपनायेंगे।




शांति का संदेश लिये हम , नये तराने गायेंगे ।
कभी नही हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे
तीन रंगों का प्यारा झंडा, शान से हम लहरायेंगे।
कभी नही हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे ।









रचना  
महेन्द्र देवांगन "माटी"
गोपीबंद पारा पंडरिया 
जिला -- कबीरधाम  (छ ग )
पिन - 491559
मो नं -- 8602407353 
Email -mahendradewanganmati@gmail.com

शनिवार, 21 जनवरी 2017

पीहू की  कहानी  पीहू की जबानी


पीहू की  कहानी  पीहू की जबानी

एक दिन मै बाहर गई  थी,  मुझे  ख्याल आया  कि  मैं नानाजी के  साथ  संग्रहालय देखने  जाऊँ । जब मैं   वहाँ  गई तो  मुझे वहाँ  पुराने जमाने के  अलग  अलग  जानवर  पक्षी  देखने  को  मिले  । a वहां  पे मुझे पुराने जमाने की   वीर  प्रजातियां  देखने  को  मिली ।
वहाँ   बहुत  अच्छे  जानवर  पक्षी थे ।  पिछले  बार  मैं  जब  संग्रहालय  देखने  गई  थी तब भी  मुझे  बहुत  मजा  आया  था  और इस  बार  भी  मुझे  बहुत  मजा  आया  है ।  इस  तरह  मैंने  अपनी  छुट्टियां  बहुत  मजे मे गुजारी ।  बहुत  शीघ्र  मै दूसरी  कहानी  सुनाऊँगी । धन्यवाद ।











पीहू
सुपुत्री श्रीमती स्तुति और श्री संजीव श्रीवास्तव
फ्रीडम  फिघ्टर्स एन्क्लेव
नई  दिल्ली  

सोमवार, 16 जनवरी 2017

डॉ. प्रदीप शुक्ल की पुस्तक गुल्लू के गाँव से


1. धूप बेचारी



सर्दी में सूरज अंकल ने

दे डाली है धूप को छुट्टी

मुन्ना उसके इंतज़ार में

पिए जा रहा जीवन घुट्टी



क्यों ना आई धूप समय पर

मुन्ना जोर जोर चिल्लाये

बस मालिश के इंतज़ार में

लेटा है वो तेल लगाये



दादी कहती धूप बेचारी,

बहुत दूर से वो आती है

सूरज अंकल के घर से बस

आते आते थक जाती है



पूरे बरस काम वो करती

ज़र्रे ज़र्रे को चमकाए

बस थोड़े दिन जाड़े में औ’

बारिश में ही ना आ पाए



देखो तेरी दीदी भी तो

सन्डे को स्कूल न जाये

आ जायेगी धूप बेचारी

काहे तू इतना चिल्लाये?



                                   डॉ. प्रदीप शुक्ल

.

मकर संक्रांति मनाये

आओ हम सब मकर संक्रांति मनाये
तिल की लड्डू सब मिलकर खाये।
घर में हम सब खुशियाँ फैलाये
पतंगे हम खूब उड़ाये।
सब मिलकर हम नाचे गाये
मौज मस्ती खूब उड़ाये।

आओ हम सब मकर संक्रांति मनाये
तिल की लड्डू सब मिलकर खाये।
गली मोहल्ले मे बांटे सारे ।
सब मिलकर कर खाये प्यारे
गंगा में डूबकी लगाये ।
शरीर अपना स्वस्थ बनाये ।
आओ हम सब मकर संक्रांति मनाये
तिल की लड्डू सब मिलकर खाये।।




















रचना  प्रिया देवांगन "प्रियू"  गोपीबंद पारा पंडरिया  जिला -- कबीरधाम  ( छ ग ) Email --priyadewangan1997@gmail.com