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रविवार, 16 जुलाई 2017

शरद कुमार श्रीवास्तव का बालगीत : मेरी  नानी अच्छी  नानी


मेरी  नानी अच्छी  नानी
प्यारी  सी सुना  कहानी
एक  हो राजा एक  रानी
परी देश की या महारानी


मेरी  नानी अच्छी  नानी
प्यारी  सी सुना  कहानी
बादल देश काला काला
या सुन्दर  परियों वाला

मेरी  नानी अच्छी  नानी
प्यारी  सी सुना  कहानी
पंखों वाला घोड़ा  ही हो
रेस में  कभी दौड़ा भी हो

भाता नही पोकेमान देखो
बोर लगता डोरेमान देखो
मेरी  नानी अच्छी  नानी
प्यारी  सी सुना  कहानी

मम्मी को  उसकी  नानी
थीं सुनाती रोज कहानी
मेरी  नानी अच्छी  नानी
तू भी मुझे  सुना कहानी


                          शरद कुमार  श्रीवास्तव







डॉ प्रदीप शुक्ल का बालगीत : आदम घर


झाँक रही नन्ही सी चिड़िया 
घर के अन्दर ऐसे 
चिड़ियाघर में झांकें हम 
नन्ही चिड़ियों को जैसे 

बड़े जानवर मगर भला 
क्यों धीरे धीरे चलते 
चलते क्या बस हौले हौले 
यहाँ से वहाँ सरकते 

छोटे से दड़बे में जाने 
कैसे ये रह लेते  
साँस छोड़कर वही साँस 
वापस फिर से ले लेते  

मन चाहा आकाश नापने 
का सुख ये क्या जानें 
इतना बड़ा शरीर भला 
ये कैसे उड़ें उड़ानें 

धन्यवाद भगवान तुम्हारा 
मुझको पंख लगाया  
इस दड़बे के बंधन से 
मुझको आज़ाद कराया 

पर इनके संग तुमने जाने 
क्यों की नाइंसाफ़ी
बड़े जानवर छोटे घर में 
जगह नहीं है काफ़ी 

' आदम घर ' को देख के मेरा 
मन अजीब सा भैय्या 
ऐसा ही कुछ मन में बोले 
बैठी हुई चिरैय्या.




                                   डॉ. प्रदीप शुक्ल 

अंजू श्रीवास्तव निगम की बालकथा : पेड़ जीवन रक्षक





अशिमा अपने मम्मी-पापा के साथ लेह के हवाई -अड्डे पर उतरी|😘😘😘लेह.की सुदंरता के बारे मे वो काफी लोगों से सुन चुकी थी|🎊🎊🎊हवाई-अड्डे पर उतरते ही उसे लेह की मनोरम वादियाँ भा गयीं थी|💝💝💝बस एक बात उसे खटक रही थीं|  यहां की वादियाँ एकदम पथरीली एवं वीरान. थी| हरियाली रहित|🙅🙅

     अशिमा को हवाई अड्डे पर उतरते ही आक्सीजन की जबरदस्त कमी लगी|दोस्तों की राय मुताबिक एक पूरा दिन आराम मे बीता|🎊🎊ताकि उनका शरीर लेह के मुताबिक ढल जाये|😘😘



Shey  Monastery


      अशिमा दूसरे दिन लेह और उसके आसपास घूमने निकले|  shey monastery ,  thik shey monastery,  सिंधु नदी,  संगम और मेगनीटिक पाइट| 💝💝💝💝 चारो ओर प्रकृति के रंग बिखरे थे|🎁🎁🎁 बस कमी पेड़-पौधों की लगी|

   जब अशिमा thikshay monastery जा रहे थे| तब उसे काफी बडे पैमाने मे पेड़ लगे दिखाई पड़े| अशिमा का मन खुश हो गया|🎊🎊🎊 साथ बैठे अंकल ने ही बताया कि उनके महान लामा गुरु की वजह से  ही सब सभंव हो सका|😘😘😘   10अक्टुबर 2010 मे करीब 4000 लोगों ने ये पौधे रोपे थे|  🎁🎁इससे पहले के जुलाई माह मे बादल फटने से यहाँ  जबरदस्त तबाही हुई थी| जिसे देख ये कदम उठाया गया|😘 आज वो पौधे पेड़ का रूप ले चुके   है|💝💝यह सुनकर  अशिमा को बेहद खुशी हुई|



      तीसरे दिन अशिमा अपने मम्मी पापा के साथ चागला पास होते हुये पेगयोनग झील गये|  चागला ऊचाई मे होने की वजह से उसकी मम्मी की तबीयत काफी खराब हो गई| वैसे भी दस मिनट से ज्यादा वहाँ कोई रूक नही सकता|👏👏ऊचाई की वजह से उन्हें सांस लेने मे दिक्कत हुईं|

    अशिमा ने लेह और उसके आसपास फैले सुदंर नजारों का खुब आंनद लिया| पर पेड़ पौधों की कमी ने धूल-मिट्टी का साम्राज्य स्थापित कर दिया हो जैसे|🙅🙅🙅पर अब अशिमा को पेड़ पौधों के महत्व का भी पता चला|🎊🎊💝😘

अशिमा ने तय किया कि घर लौटते  ही वो अपने घर के आसपास पेड़ जरूर रोपेगी|~💝~यही नही इसे वो मुहिम भी बनायेगी|😘🎊🎊

    लेह की इस यात्रा ने अशिमा को अपने आसपास के वातावरण के लिये भी सजग कर दिया|🎊😘💝😘💝



                              अंजू  श्रीवास्तव  निगम 


शरद कुमार श्रीवास्तव की बाल कथा : वफादार टामी





लालबिहारी  को  अपनी माँ का बाहर का काम  करना पसंद  नहीं  है  । उसकी  माँ  रोज सबेरे लालू  को उसकी  दादी के पास  छोड़कर  अपने पति के  साथ  मजदूरी  करने  के  लिए  चली जाती है ।   लालू  अपनी  दादी  के  साथ  दिन भर  खेलता रहता  है  परन्तु सरे शाम  अपनी  माँ  के काम  से  वापस  आने  के  समय  से  कुछ पहले  से  ही  झोपड़ी  के  दरवाजे  पर छुपकर  खड़ा  हो  जाता है  ।   जैसे ही  उसके  माता पिता घर  वापस  आते  तो लालू  उनसे  चिपक जाता है  ।

लाल बहादुर  के  माता पिता   काम से  लौटते समय  लालू के लिये कुछ न कुछ,  खाने  के  लिए  लेकर  आते हैं ।  वह बहुत  चाव से खाता है , लेकिन  उसका कुछ  हिस्सा उसके  घर के बाहर  खडे टामी कुत्ते  को  भी  देता है ।   टामी से लालू की बहुत  दोस्ती  है ।   टामी को भी लालू के माता पिता के  आने की  प्रतीक्षा  रहती है  और वह  उन लोगों  के  आते ही दुम हिलाकर  अपनी खुशी प्रदर्शित करता है ।   लाल बहादुर की दादी  को लेकिन  लालू की टामी से दोस्ती  अच्छी  नही लगती है ।   उन्हें  लगता  है  कि  कही टामी  छोटे  बच्चे  को  काट न ले। वह इसलिए   एक छड़ी लेकर   टामी को भगाया  करती  हैं  ।   लाल बहादुर  लेकिन टामी के साथ  मिलकर  खेलना बहुत  अच्छा  लगता  है   ।  वह   टामी के साथ  सड़क पर दौड़ता  रहता  है  और   किनारे  बने पार्क तक भाग कर  पहुंच  जाता है    ।

एक दिन रोज  की  तरह  सड़क पर लाल बहादुर  खेल रहा था  कि  सड़क  पर  एक  पतंग  कही से कट कर  आ गई ।    रंग  बिरंगी  पतंग  को पकड़ने  के लिए  लालू दौड़  पड़ा  ।   इस भाग  दौड़  में  वह सड़क  के  किनारे  खड़ी  एक गाडी से टकरा  कर  गिर  पड़ा  ।   लालू को  चोट  आ गई   ।  उसके  खून  बह रहा  था  और वह  चल नहीं  पाया रहा था  ।  टामी भौंकते  हुए  लालू  के  घर जाकर  वहाँ   से  उसकी दादी  को कपड़े  से  पकड़  कर अपने  साथ   ले आया ।     दादी लाल बहादुर  को गोद  में  लेकर  घर ले आयीं ।  अब दादी  को समझ  में  आ  गया कि कुत्ते  वफादार  होते हैं ।



                                   शरद  कुमार  श्रीवास्तव




त्रिलोक सिंह ठकुरेला की रचना सबसे मिलती सीख



मकड़ी से कारीगरी,बगुले से तरकीब.
चींटी से श्रम सीखते,इस वसुधा के जीव.
इस वसुधा के जीव, शेर से साहस पाते.
कोयल के म्रदु बोल,प्रेरणा नयी जगाते.
'ठकुरेला' कविराय,भलाई सबने पकड़ी .
सबसे मिलती सीख,श्वान,घोड़ा या  मकड़ी.




-                                           त्रिलोक सिंह ठकुरेला

अंजू गुप्ता की इस पत्रिका में पूर्व प्रकाशित कहानी : जब जागे तभी सबेरा


गुरुवार, 6 जुलाई 2017




प्रिन्सेज डॉल से एक परी कथा

शरद कुमार श्रीवास्तव की बाल कथा : टिंकपिका की सैर









नन्ही  चुनमुन  ' प्रिन्सेज डॉल '  फेरी टेल्स, की  पुस्तक  में  से "टिंकपिका का जादूगर "  वाली   कहानी  अपनी  दादी  से सुन चुकी  थी  ।  उसने सोचा  कि  कितना भयानक  होगा  टिंकपिका ।   उसे सोफे पर  बैठे  बैठे  ही दीवार  पर  एक मकड़ी  दिखाई  दी  ।  वह  पहले  घबरा  गई  लेकिन  उसने  फिर  सोचा कि वह  क्यों  घबरा रही है  ।  वह  तो अपने  स्कूल  का  सारा काम  जो घर मे करने के  लिए  दिया जाता  है  वह खुद अपने  आप  कर लेती है   बस  कभी कभी  अपने  पापा से  मदद  लेती है  ।   यह कोई भी  बुरी बात  नहीं  है  ।   तभी   उसे लगा कि दीवार की मकड़ी  बस उसे ही देखे जा रही है ।   उसने  अपनी  निगाह  मकड़ी  की  तरफ  से  फेर ली और  अपने मोबाइल  पर  गेम  खेलने मे बिजी  हो गई  ।




  गेम खेलते  हुए    न जाने  क्या  हुआ  कि  वह  मोबाइल की स्क्रीन  पर वह  एक अजनबी  जगह  पहुँच गई  ।    वह जगह  एक पुराना किला था  ।  उसके  दरवाजे  पर  भयानक  दिखने वाले  पहरेदार  खड़े  थे  जिनकी  बड़ी  बड़ी  मूछें थी ।  बडे-बडे  बाहर की  ओर  निकले दाँत  थे ।    इस किले में  घुसते  ही  एक बड़ा  सा  कमरा  था ।  उस कमरे मे काली  पोशाक  में  ऊँची  लम्बी  जादूगर  वाली कैप पहने  एक जादूगर  बैठा था  और उसके  सामने  मक्खी,  मकड़ी,  काकरोच, चींटे सहित कई  अन्य  कीड़े मकोड़े खडे होकर  अपनी  बातें   सुना रहे  थे ।     ज्यादातर  कीड़े उन बच्चों  की   खबर  लाए थे जो अलग अलग  वजह  से  कमजोर  हो रहे थे  ।     जादूगर  उनसे  कहा रहा  था  कि  ठीक  है वे उन बच्चों  को  उलझाए  रखें  ताकि  वे थोड़ा  और  कमजोर  हो  जाएँ तो जादूगर  खुद   जाकर  आसानी  से  उन्हें  टिंकपिका ले आए  और  रोबोट  बना  कर  उनसे  काम  कराए  ।    नन्ही  चुनमुन  ने इन कीडों  को यह कहते आगे सुना  कि  ज्यादातर  बच्चे  होमवर्क  तो कर लेते  हैं  परन्तु  मोबाइल  से चिपके  रहते  हैं  ।   वे  बाहर  खेल कूद  नहीं  कर सकते  हैं ।   इसलिये   ताकत मे कमजोर  हो  रहे हैं , हमारी  उनपर नजर  है ।   नन्ही  चुनमुन ने मोबाइल  फोन  पर  से नजर  हटाई  तो ऊपर मकड़ी   अपनी  आँखें  मटका  कर उसे  घूरते  नजर आई मानो वह कहते रही हो कि यही था  टिंकपिका का जादूगर  जो टिंकपिका  मे अपने किले मे बैठा था ।  अब तक  चुनमुन सचेत हो गई थी  और  वह मोबाइल  फोन  को छोड़कर   साइकिल  चलाने  लगी।


                        शरद  कुमार  श्रीवास्तव 

महेन्द्र देवांगन "माटी" की रचना : पेड़ लगाएं







चलो चलें एक पेड़ लगायें, 

धरती को हम स्वर्ग बनायें ।

चारों ओर हरियाली छाये ,

खुशियों की बगिया महकायें ।


पौधे लाकर हम लगायें, 

चारों ओर घेरा बनायें ।

खाद पानी रोज डालें, 

जानवरों से इसे बचायें ।


नये नये कोपल निकलेंगे ,

हर डाली पर पत्ते बिखरेंगे ।

उड़ उड़ कर पक्षी आयेंगे ,

चींव चींव मीठे गीत गायेंगे ।


ताजा ताजा फल लगेंगे, 

बच्चे बूढ़े खुश रहेंगे ।

सुंदर सुंदर फूल खिलेंगे ,

इसकी सेवा खूब करेंगे ।




                       महेन्द्र देवांगन "माटी"

                     गोपीबंद पारा पंडरिया 

                      जिला -- कबीरधाम  (छ ग )

                     पिन - 491559

                    मो नं -- 8602407353 

Email -mahendradewanganmati@gmail.com

महेन्द्र देवांगन माटी की बाल कविता : बरसात







बरसात का मौसम आया ,

बादल गरजे पानी लाया ।

झम झमाझम गिरे पानी, 

पानी खेले गुड़िया रानी ।


चम चमाचम बिजली चमके, 

छोटू छुप जाये फिर डरके ।

आसमान में काले बादल ,

दिख रहे हैं जैसे काजल ।


चुन्नू मुन्नू नाव चलाये, 

दादा दादी खूब चिल्लाये ।

दोनों पानी में भीग रहे, 

आक्छी आक्छी छींक रहें ।


टर्र टर्र मेढक चिल्लाये ,

पानी को फिर से बुलाये ।

पानी गिरे झम झमाझम, 

नाचे गुड़िया छम छमाछम ।


चारों ओर  हरियाली छाई, 

खेतों में फसलें लहलहाई ।

खुश हो गये  सभी किसान ,

मिट गई चिंता की सभी निशान ।


 

                         महेन्द्र देवांगन माटी 

                         पंडरिया छत्तीसगढ़