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बुधवार, 14 नवंबर 2018

मधु चौहान की रचना मेरी परछाईं

                   
      
   एक मैं और एक वो मुझ -सी 
   मैं श्वेत वो स्याह श्याम - सी 
   कभी जुदा, कभी मुझ में समाती
   बनकर एक अनजाना साथी 
   खेले मुझ संग आँख- मिचैली
   तपती दोपहरी की हमजोली
   मैं और मेरी परछांई 
   एक दिन मैं हँसकर यूँ बोली-
   ”क्यों तू साथ मेरे है चलती
   आगे- पीछे कभी दाएँ- बाएँ
   पर छोड़ मुझे कहीं न जाती ?” 
   हँस कर इठला कर वो बोली-
   ”तुझ से बना मेरा ये रुप
   कैसे रहँू भला तुझ से दूर ?”
   साथ चाहे कोई छोड़ दे तेरा 
   पर मैं साथ निभाऊँगी
   जलती धूप में भी संग तेरे
   आगे- आगे आऊँगी
   कैसे तुझे छोडँू और बनूँ पराई
   आखिर हँू तो तेरी परछांई 
   आखिर हँू तो तेरी परछांई ।। 

 
    मधु चौहान

                                  

बल दिवस पर सुशील शर्मा की कृति: मनहरण घनाक्षरी (8887 वर्णों पर यति,समान्त पदान्त)



फूलों जैसे हम प्यारे,
माँ के हैं राजदुलारे,
पापा की आंखों के तारे,
हाथ तो मिलाइए।

टन से बजी है घण्टी,
गुरुजी की उठी शंटी,
सबक तो याद नही,
अब शंटी खाइए।7

चुन्नू मुन्नी है चिल्लाते,
धीमे से हमें बुलाते,
पापा क्यों आंख दिखाते,
आप समझाइए।

हम नन्हे से हैं बच्चे,
मन के हैं सीधे सच्चे,
हमें देख कर आप,
जरा मुस्कुराइए।

                       सुशील शर्मा

मधु त्यागी का बालगीत : देश हमारा




देश हमारा सबसे न्यारा,
है सबको प्राणों से प्यारा।
सुंदर इसे बनाएँगे, 
फूलों सा महकाएँगे।

उत्तर में है खड़ा हिमालय,
गाता गौरव गाान।
दक्षिण में सागर लहराता,
और इसके चरणों को धोता।
हरे भरे हैं खेत यहाँ पर,
झरने मीठे गीत सुनाते।

भिन्न- भिन्न हैं धर्म यहाँ पर,
भिन्न भिन्न भाषाएँं।
भिन्न भिन्न है जाति सबकी,
भिन्न भिन्न हैं वेश।
पर किसी तरह का भेद नहीं है,
और नहीं है द्वेश।

मातृभूमि के चरणों में हम,
मिलकर अपना शीश नवाएँ।
नवजीवन की अलख जगाएँ,
और धरती को स्वर्ग बनाएँ।


             - मधु त्यागी

गुराशीष सिंह , कक्षा - दसवीं ,ऐमिटी इंटरनेशनल स्कूल की बालकथा : हिफ़ाज़त सैक्टर - 46, गुड़गाँव


           
                          

एक बार एक महात्मा सत्संग करने जा रहे थे , रास्ते में उनकी नज़र एक लड़के पर पड़ी जो पेड़ के नीचे लेटे - लेटे भगवान से बातें कर रहा था, ‘‘ हे भगवान मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है, ऐसा कर तु नीचे आ जा, हम दोनों मिलकर रहेंगे । मैं तुम्हे अपनी भेड़ों का दूध पिलाऊँगा, तुम्हारे मैले कपड़े धोऊँगा, हम दोनों मिलकर खेलेंगे ।’’ उसने भगवान को कभी देखा नहीं था इसलिए वह अपनी कल्पना में भगवान को वैसा ही देख रहा था जैसा वह स्वयं था   
तभी  महात्मा  उसे डाँटते हुए बोले , ‘‘अरे ! मूर्ख लड़के तूने भगवान को क्या समझा है , तू उनका अपमान कर रहा है। तुझे तो प्रभु का नाम लेने का भी कोई हक नहीं, क्योंकि तू दलित है।’’ 
महात्मा के कटु वचन सुनकर लड़के की आँखों में आँसु आ गए। दुखी होकर वह बोला, ‘‘ हे महात्मन मैंने प्रभु को कभी देखा नहीं पर मैं यह जानता हूँ कि जिसने मुझे दलित बनाया है उसी ने आपको महात्मा बनाया है।’’ 
लड़का रोते- रोते वहाँ से चला गया और महात्मा जी अपने रास्ते चले गए, अपनी मंज़िल पर पहुँच कर उन्होंने सत्संग करना आरंभ किया परंतु आज वह बात नहीं थी जो पहले हुआ करती थी। दुखी होकर उन्होंने ईश्वर से कारण पूछा तो स्वयं उसके अंतर्मन से आवाज़ आई,‘‘आज तुमने एक अबोध बालक का नहीं अपितु मेरा दिल दुखाया है। मैं किसी मंदिर, मस्जि़्ाद, गुरुद्वारे में नहीं रहता, मैं तो सबके दिलों में वास करता हूँ और मेरे घर की हिफाज़त करना तुम्हारा काम था । 
                                                               -      गुराशीष सिंह
                                                                      कक्षा - दसवीं
                                                                     ऐमिटी इंटरनेशनल स्कूल
                                                                      सैक्टर - 46, गुड़गाँव

प्रिया देवांगन " प्रियू" की रचना: चलो चले एक पेड़ लगायें










चलो चले एक पेड़ लगायें  ।
पेड़ लगाकर पर्यावरण बचाये।।
पेड़ो से मिलती है  शुद्ध हवा।
शुद्ध हवा हर रोग से बचाये।।
मीठे मीठे फल लगेंगे।
रंग बिरंगे फूल खिलेंगे।।
बागों में हरियाली होगी ।
चारों तरफ खुशहाली होगी ।।
शुद्ध वातावरण मिलेगा ।
राही को छांव मिलेगा ।।


प्रिया देवांगन " प्रियू"
    पंडरिया 
जिला - कबीरधाम 
 (छत्तीसगढ़)

दीवाली के रंग , पटाखों के संग: महेंद्र देवांगन "माटी




खुशियों की बहारें लेकर, आई है दीवाली ।
सबके मन "अनार " फूट रहा, छाई है खुशहाली।।
इठलाती गलियों से निकले, रंग-बिरंगी "फूलझड़ी " ।
नाज नखरा अपना दिखाये, "चुरचुटिया "की लड़ी।।
गोल-गोल जब " चरखी" घूमे, पप्पू खूब चिल्लाये ।
बड़े मजे से शुभम भैया," राकेट" खूब चलायें ।।
"पिस्तौलें " लेकर निकला है, देखो छोटू राजा ।
दौड़ा-दौड़ा कर सबको मारे, बजादे बैंड़ बाजा।।
" तोता" की आवाज सुनकर, नाचे प्रिया रानी ।
"ताजमहल " जब फूटे धड़ाम से,कान दबा ले नानी ।।
गली-गली में फूट रहा है, धड़ाधड़ "एटम बम" ।
जोर सब आजमा रहे, किसमें कितना है दम ।।
कोई मनाये खुशी तो, कोई करे गुस्सा ।
किसी का फटाका जोर से फूटे, किसी का निकला फुस्सा।।

महेंद्र देवांगन "माटी "
पंडरिया छत्तीसगढ़ 
8602407353
mahendradewanganmati@gmail.com 

परी महाजन की रचना :चाचा नेहरू

गुलाब का फूल है जिनकी पहचान
टोपी बढ़ती है जिनकी शान
बच्चों पर देते थे जान
ऐसे थे चाचा नेहरु महान।

विश्व शांति की छेड़ी तान
प्रगति का दिया हमें ईनाम
अमन-शांति का दिया पैगाम
गुलाबों सा महकाया हिंदुस्तान।

भारत को करवाया स्वतंत्र
भरा हर दिल में प्रेम का मंत्र
हार न होगी, ये भी समझाया
आगे बढ़ने का पाठ हमें पढ़ाया

बच्चों से है इनका पुराना नाता
ये हर दिल समझ ना पाता
जन्मदिवस किया बच्चों के नाम
हे चाचा नेहरु, तुम्हें शत-शत प्रणाम ।



                         










                                                         परी महाजन
                                                         कक्षा - नौ डी
                                                         ऐमिटी इंटरनेशनल स्कूल
                                                         गुरूग्राम

अनवी पाल की बाल रचना : जन्मदिन का कार्ड





   दादाजी के जन्मदिन पर            
   सोचा था कार्ड बनाऊँगी 
   जैसे कार्ड सबको देती हँू
   दादू को भी देके दिखाऊँगी 

                सोच रही थी कुछ अलग ढंग से
                अपना प्यार जताऊँगी
                जिसे देखकर दादू खुश हों
                ऐसा कुछ दिखलाऊँगी

   इसी सोच की उधेड़ बुन में
   प्यारा समय याद आ गया     
   दादू ने कितना लाड़ किया
   सोच के मन इतरा गया

                दादू के कंधों पर  बैठकर मैं
                मेला देखने जाती थी
                रोज स्कूल की छुट्ठी पर मैं
                आइसक्रीम लेकर खाती थी

   ये सब सोचकर समझ में आया                  
   मैं वो वक्त दोबारा नहीं ला सकती                   
   जो दादू जितना प्यार दिखाएगा
   मैं ऐसा कार्ड नहीं बना सकती ।

                                      अनवी पाॅल
                                            कक्षा - चार सी 
                                            एमिटी इंटरनेशनल स्कूल

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

किस्सा मिस्टर मुसद्दीलाल : शरद कुमार श्रीवास्तव






मुसद्दीलाल जी रोज प्रातःकाल टहलने के लिये जाते हैं,यह मैंने सुना तो था । परन्तु अपनी आँखों से देखने का मौका आज सुबह ही मिला।  प्रातःकालीन सैर तो सैकड़ों लोग करते हैं  लेकिन उनके बेढंगी शारीरिक बनावट और उसपर उनका नगाड़े जैसा पेट देखने में हास्यप्रद लगने वाले अपने मुसद्दी लाल जी भी करते है, ऐसा मैंने पहले तो नहीं सोचा था . मुझे लोगों से पता चला था ।   लोग इस बात को भी मजाक बना देते हैं परन्तु मेरा मानना है कि किसी की शारीरिक बनावट जो भगवान की देन है पर हसना अच्छी बात नहीं है ।आज गुड़िया की मम्मी ने सुबह-सुबह ही मुझे सोते से उठा दिया था। बोली आज दूधवाला नहीं आयगा, वह मुझे कल ही बता कर गया है।   मैं तैयार होकर  दूध ले आया और लाकर घर में दे दिया ।   फिर  मैंने सोचा कि बिस्तर मे पुनः वापस जाने से तो अच्छा है कि प्रातःकालीन की सैर का मजा लिया जाये । दौड़ने वाले जूते पहन कर मै भी टहलने निकल गया । 

कुछ ही दूर सड़क पर मुसद्दीलाल जी भी मिल गए। प्रातःकालीन नम्स्कार अभिवादन करके हम साथ साथ चलने लगे कि एक स्थल पर पहुचते ही अचानक मुसद्दी जी तेज़ दौड़ने लगे और मै पीछे रह गया। उसी दिन किसी  काम से मुसद्दीलाल जी मेरे आफिस आये तो मैंने उनसे सुबह भ्रमण के दौरान अचानक दौड़ने का जिक्र किया और कारण पूछा।  वह बड़े भोलेपन से बोले , भाईसाहब, आपने देखा नहीं था वहाँ एक नोटिस बोर्ड लगा है जिसपर लिखा है ” स्पीड १० कि मी प्रति घन्टा”। मेरी स्पीड तो तीन या चा कि मी ही रहती है न ।  मुझे हंसी आ रही थी परन्तुमैमैं हँस भी नहीं पा रहा था। मैने उन्हें समझाया कि वह तो मोटर वाहनों के लिखा हुआ होता है आप के लिये नहीं । बाद मे जब भी उनकी इस बात का ख्याल आता है तो मै अपनी हंसी रोक नहीं पाता हूँ ।


                               शरद कुमार श्रीवास्तव 

दिल्ली की बाजार : बालगीत : शरद कुमार श्रीवास्तव




सजधज कर निकली बिल्ली जी दिल्ली की बाजार
दिल्ली की बाजार मे बिल्ली जी को  मिले  चूहे चार
हालचाल पूछा मौसी से थे आदत से एकदम लाचार
झपटी बोली भूख लगी चारों कहाँ छुपे थे बरखुर्दार


                                शरद कुमार श्रीवास्तव