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शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

गुलाब और काँटें" प्रिया देवांगन "प्रियू" का बालगीत



रहता काँटों संग मैं, मेरा नाम गुलाब।
जिसके हाथों में गया, लगे देखने ख्वाब।।
लगे देखने ख्वाब, प्रेम जोड़े हैं भाते।
करते जब इजहार, सदा मुझको वे लाते।।
खुशियाँ उनकी देख, नहीं कुछ मैं भी कहता।
काँटों का ये दर्द, सहन कर मैं हूँ रहता।।

देते हरदम साथ हैं, मेरे सच्चे यार।
रक्षा करते है सदा, और निभाते प्यार।।
और निभाते प्यार, कभी वे चुभ से जाते।
बैठे बनकर ठाठ, हाथ कोई न लगाते।।
काँटों की है बात, इसे कोई नहिँ लेते।
रखते हैं सम्भाल, साथ वो हरदम देते।।




प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

मिट्ठी की चहचहाहट : शरद कुमार श्रीवास्तव की बालकथा

 



मिट्ठी सुबह ही से चुनमुन को आवाज लगा रही थी दीदी बहुत  भूख लगी है ।  लेकिन  चुनमुन  तो उस दिन अपने पापा की गोद  मे चिपक कर सो रही थी उसे याद नही था कि मिट्ठी के पिंजड़े मे कुछ नाश्ता भी रखना है ।  चुनमुन  रात मे अधिक पढ़ाई-लिखाई के कारण देर  से सोई थी ।  उसकी  मम्मी भी उसे उठा नहीं रहीं थी ।   मिट्ठी की चीख़-पुकार  सुनकर  चुनमुन की मम्मी  पहले समझ नहीं पायीं कि  उसने यह हल्ला गुल्ला क्यों मचा रखा है ।   दरअसल  मिट्ठी के साथ खेलने के कारण  चुनमुन  को ही यह सब पता होता है कि मिट्ठी को कब फल देना है कब मिर्च  और कब रोटी पानी ।  मम्मी ने समझा कि मिट्ठी को शायद धूप  मे बैठना है इसलिए  उसके पिंजड़े  को बालकनी मे रख दिया और  अपने काम मे लग गईं।  

 बालकनी मे मिट्ठी की चहचहाहट बढ़ गई ।   चुनमुन के द्वितीय  तल के फ्लैट  की बालकनी मे बिल्ली या कुत्ते के आने का डर नही था अतः चुनमुन  की मम्मी निश्चिंतता से सुबह  का चाय नाश्ता बना रहीं थी उन्हे मिट्ठी की चहचहाहट  मे कोई खास बात  नही समझ  आ रही थी लेकिन  चुनमुन  को मिट्ठी की चहचहाहट  अजीब  लगी और  वह पापा की गोद छोड़कर  बालकनी मे मिट्ठी के  पिंजड़े के पास आई ।

बालकनी मे आने पर चुनमुन  कै आश्चर्य  का ठिकाना न रहा वहाँ मिट्ठी के पिंजड़े के पास और दो तोते आ गएं हैं और उनका  मधुर राग अलाप चल रहा है।   यह देखकर  चुनमुन  के पापा ने चुनमुन  को समझाया कि जैसे मनुष्य  एक सामाजिक  प्राणी है वैसे सब जीव जन्तु भी सामाजिक  प्राणी है और यह मिट्ठी भी



शरद कुमार श्रीवास्तव 

"पापा की यादें" रचनाकार प्रिया देवांगन "प्रियू"




नजर ढूंँढती है राहों पर, पापा जल्दी आओ ना।।

हमें छोड़ क्यों चले गये हो, पापा जरा बताओ ना।

बैठे-बैठे रोते रहते, खाना नहीं खिलाता है।
प्यास लगे तब भी मुँह में जी,पानी नहीं पिलाता है।
आकर मुझको अपनी बाहों, झट से गले लगाओ ना।
हमें छोड़ क्यों चले गये हो, पापा जरा बताओ ना।।

जब से इस दुनिया को छोड़े, साथ नहीं कोई देते।
पापा बिन हम कैसे जीते, खबर नहीं कोई लेते।।
रिश्ते क्या ऐसे होते हैं, थोड़ा सा समझाओ ना।
हमें छोड़ क्यों चले गये हो, पापा जरा बताओ ना।।

जब-जब हम राहों पर चलते, अपनी नजर टिकाते हैं।
मदद माँगने जाते हैं तो, आँखे हमें दिखाते हैं।।
हम भी आगे बढ़ सकते हैं, नई सोच अब लाओ ना।
हमें छोड़ क्यों चले गये हो, पापा जरा बताओ ना।।

मोल यहाँ पैसे का होता, करे उधारी अपने ही।
अपने ही पैसे मंँगने को,पड़े भिखारी बनने ही।।
यहाँ सामना कैसे करना, आकर के समझाओ ना।
हमें छोड़ क्यों चले गये हो, पापा जरा बताओ ना।।





प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com

"छोटी सी जिंदगी" "दोहे"

 

हँसता हुआ  खिला चेहरा




छोटी सी है जिंदगी, भर दो जी मुस्कान।
चार दिनों का है सफर, परेशान इंसान।।

हँस कर जीना सीख लो, करो सभी से प्यार।
सुख-दुख जीवन अंग है, कभी न मानो हार।।

माटी का ये देह हैं, करना नहीं घमंड।
ईश्वर बैठे देखते, तुम्हें मिलेगा दण्ड।।

भेद-भाव को छोड़ कर, रहना सब के साथ।
विपत समय आये सखी, पकड़े रहना हाथ।।

आये खाली हाथ है, कर लो अच्छे काम।
छोटी सी है जिंदगी, सदा कमाओ नाम।।




प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की रचना रेन कुटी

 



         सुबह -सुबह चिड़िया चिल्लाई,
         इसे काटते क्यों हो भाई?
         पेड़ हमारे स्थाई घर,
         यहीं सदा मैं रहती आई|

         इसी पेड़ पर बरसों पहले,
         एक चिड़े से हुई सगाई|
         तिनका तिनका जोड़ जोड़ कर,
         मैंने दुनियाँ एक सजाई|

         इसी पेड़ की किसी खोह में,
         अंडे बहुत दिये हैं मैंने|
         पाल पोसकर बड़े किये हैं,
         चूजे मैंने यहीं सलोनें|

         यहीं ठंड काटी है मैंनें,
         बिना रजाई या कंबल के|
         यहीं ग्रीष्म में कूदे हैं हम,
         इन डालों पर उछल उछल के|
    
        अगर पेड़ काटोगे तो हम,
        बेघर होकर कहाँ रहेंगे|
        डालों की थिरकन पर पत्तॊं ,
        की कब्बाली कहाँ सुनेंगे|

        अरे लकड़हारे वापस जा,
        दाल यहाँ पर नहीं गलेगी|
        आज हमारी 'रेन कुटी' पर,
        क्रूर कुल्हाड़ी नहीं चलेगी|





        


   

प्रभुदयाल श्रीवास्तव 

12 शिवम सुन्दरम  नगर         

 छिंदवाड़ा म प्र

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

प्रिन्सेज डॉल के लड्डू : शरद कुमार श्रीवास्तव

 


 




प्रिन्सेज के स्कूल मे आज मैडम ने बच्चो की एक टिफिन पार्टी रखी थी. यह पांर्टी इसलिये थी ताकि बच्चे मिल जुल कर खायें. शेयर कर के खाने से एक सोशल बनने की प्रकृति जाग्रत होती है. शेयर करने से बच्चे हिल मिल कर रहना सीखेगे . टीचर ने हर बच्चे को अपने- अपने घरों से अलग- अलग किस्म की चींजे लाने को कहा गया है. छह- छह बच्चो को वही- वही चीजें लाने को कहा गया ताकि सामान बरबाद न हो और किन्ही पेरेन्टस् पर अधिक बोझ भी नहीं पडे़. रूपम डॉल को पोहा लेकर जाना था तो शुभम को पीजा ! लेकिन प्रिन्सेज डॉल को तो मिठाई लेकर जाना है . प्रिन्सेज को मिठाई मे लड्डू बहुत पसन्द है . उसे लड्डू पसन्द होने की एक वजह है मोटू पतलू वाले मोटू को समोसे पसंद हैं तो छोटा भीम की तरह प्रिन्सेज को भी लड्डू पसंद हैं . उसकी मम्मी लड्डू घर मे कम लाती है. टीचर जी ने जब डायरी मे लिखकर दिया है तब तो मम्मी को पापा जी से लड्डू लाने को कहना पडा़ .


शाम जैसे ही हुई ,पापा जी आफिस से लौटते हुए लड्डू लेकर आये. उन्हे मालूम था कि उनकी प्यारी बिटिया को लड्डू बहुत पसंद है इसलिये मिठाई का डिब्बा खोल कर पापा जी अपने हाथों से दो लड्डू अपनी दुलारी बेटी को प्लेट मे रखकर दिया . प्रिन्सेज ने जल्दी जल्दी दोनो लड्डू गटक लिये . उसने पापाजी से एक और लड्डू की फरमाइश की तब पापा जी ने उसे एक और लड्डू दे दिया . उस समय तक प्रिन्सेज की मम्मी ऑफिस से नहीं आयी थीं . मम्मी जी जब ऑफिस से घर आईं और थोड़ी देर मे घर मे जब खाना खाना हो गया तब सबके साथ प्रिन्सेज ने लड्डू खाया.


सबेरे मम्मी ने एक टिफिन बॉक्स मे आठ लड्डू रख दिये थे . पाँच लड्डू तों ग्रुप के बच्चें के लिये थे, दो लड्डू मैडम के लिये थे और एक लड्डू एक्स्ट्रा था . वैंन मे लड्डू का ध्यान प्रिन्सेज को बेचैन कर रहा था . उसने सोचा मम्मी ने एक लड्डू एक्स्ट्रा रखा है वह मै किसी को नहीं दूंगी वह उसने सबसे छुपा कर वैन मे ही खा लिया . स्कूल पहुँचने के बाद कुछ देर तक प्रिन्सेज को लड्डू का ध्यान नहीं आया लेकिन जैसे ही शानू ने छुपा कर टाफी का रैपर खोला वैसे ही प्रिन्सेज को अपने लाये लड्डू याद आगये . उसने सोचा एक लड्डू मेरे हिस्से का है वह तो मै खालूँ. जैसे ही उसने वह लड्डू निकाल कर खाना चाहा लड्डू की महक टीचर की नाक मे पड़ी और उन्होने प्रिन्सेज के हाथ से वह लड्डू वापस रखा दिया . क्लास मे कोई चीज खाने के लिये उसे दस मिनट के लिये बेन्च पर खड़ा कर दिया गया.


टीचर ने सब बच्चो को अधिक मिठाई खाने से होने वाले नुकसान के बारे मे पूछा . रिंकी बोली मैम ज्यादा मिठाई खाने से बच्चों के पेट मे दर्द होने लगता है. मैम बोली शाबाश रिंकी बिल्कुल ठीक है मिठाई मे चिकनाई घी तेल अधिक होता है जिसको अंधिक खाने से पेट दर्द करने लगता है. मन्टू बोला  हाँ मैडम , इसी वजह से मोंटे भी हो जाते हैं जिससे ठीक से भाग दौड़ भी नहीं पीतें है. टीचर ने उसे तारीफ भरी नजरों से देखा. गायत्री बोली मैम ज्यादा मिठाई ख़ाने से मेरे भाई के दाँत को कीटाणु खा चुक़ें थे इसी लियें डाक्टर ने मुँह मे इन्जेंक्शन लगाकर प्लास से दाॅत निंकलवाये थे बहुत दर्द हुआ था. प्रिन्सेज के नाना जी को डायबटीज है उसने भी बेन्च पर खड़े खड़े कहा मैम ज्यादा चीनी की चीजे खाने से डायबटीज भी हो जाती है. टीचर ने खुश होकर कहा बच्चो तुम सब लोग अच्छी तरह से जान गये कि अधिक मीठा नहीं खाना चाहिये . तब तक टिफिन की बेल हो गई थी . सब बच्चो ने टिफिन शेयर कर के खुशी मनाई।।




शरद कुमार श्रीवास्तव 



मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

चुटकुले

 


1 रामू भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि एक बहुत बड़ा मकान हो । उस मकान में खूब रुपये पैसे हो। वहाँ बड़ी बड़ी गाड़ियों हों और उस घर में मैं नौकरी करूँ।

2 सरल रोहित को मोटरसाइकिल अब नहीं चलाने दूँगा । सामने नाले में जाते जाते बची।
अमन एक और मौका तो दे सकते हो बन्दे को ।

3 एक भिखारी दूसरे भिखारी से अरे यह नई कमीज़ कितने में ली है ।
भिखारी यह वाली खरीदी नहीं है दूसरी कमीज के साथ फ्री में आयी है । 

4 दरोगा : कल तुमने शराब के नशे में धुत होकर गाड़ी पेड़ मे ठोक दी थी ।
राजू : साहब गलत संगत का नतीजा है बोतल एक थी और साथी तीन और उन लोगों ने नहीं पी । मुझे गाड़ी में छोड़कर सभी चले गए थे ।

5   बेटा  —  पापा मुझे  बाँसुरी  खरीद  दीजिए ।
पापा —  नही बेटा  तुम  दिन भर कान फाडोगे ।
बेटा — नही  पापा  रात मे जब सब सो जाऐंगे  तब बजाऊँगा

  6  चीकू — आशी बताओ मेरे पाकेट  में  कितनी टाफी  हैं  अगर सही  बताया  तो दोनो तुम्हे  दे दूंगा ।
आशी — भैय्या  मुझे  मूर्ख  नहीं  बनाओ  तुम्हारे पास  पांच  टाफी  है

संकलन: शरद कुमार श्रीवास्तव 

वीरेन्द्र सिंह बृजवासी की रचना/कोयल के अंडे!


 

कोयल  ने  अपने  अंडों  को

कौए     के      घर      छोड़ा,

चतुर  कोकिला  ने  कौए के,

अंडों    को    खुद     फोड़ा।


कौवी   ने   कोयल  के  सारे,

अंडों     को     खुद    पाला,       

कभी  न  सोचा  कोई  अंडा,

गोरा      है      या      काला।


कौआ यह सब देख देखकर,

मन   ही     मन     मुस्काया,

बोला   मेरी   पत्नी  ने  खुद,

ममता       को      अपनाया ।


बच्चे   तो   बच्चे    हैं   चाहें,

अपने    या     कोकिल    के,

उसकी करनी वह  जाने  हम,

रहें   न  क्यों   हिलमिल   के।


कुछ दिन रहकर उड़  जाएंगे,

बच्चे     नील      गगन     में,

जाने फिर  कब  तक  लौटेंगे,

सूने      इस      आंगन     में।


भेद  भाव  करना  जीवन   में,

हमें       नहीं      आता      है,

ऐसा  घ्रणित  काम  धरा  पर,

मानव      को      भाता     है।


अपनी - अपनी बोली  जग में,

अपना - अपना          दुखड़ा,

कोयल कितनी अच्छी लगती,

खोले    जब     भी    मुखड़ा।

       


         वीरेन्द्र सिंह "ब्रजवासी"

             मुरादाबाद/उ.प्र.

            9719275453

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वीरेन्द्र सिंह बृजवासी की बाल।रचना : बगला भगत!



बगला  भैया,  कहाँ   जा   रहे

ओढ़         सुनहरी       चादर

भोलेपन  पर   सभी  आपका

दिल    से      करते     आदर।



मछली  बोली भक्त शिरोमणि

मेरी      भी      सुन      लीजे

सबकी    नैया    पार   लगाने

बस     चुनाव   लड़     लीजे।


घर-घर  जाकर  मत  देने  की

विनती        करनी        होगी

उल्लू  दादा   की  चौखट  पर

नाक         रगड़नी       होगी।


श्रमका  फल  मीठा  होता  है

हर      कोई       कहता     है

छीन-झपट   करने  वाला  तो

भूखा       ही      रहता     है।


कंठी-माला   के  निशान  पर

सबकी        छाप       लगेगी

औरआपकी  खोटी  किस्मत

निश्चित        ही     चमकेगी।


मछली  देख  स्वयं  बगले  के

आया     मुख     में      पानी

एक   झपट्टे   में  मछली  की

कर     दी     खत्म   कहानी।


बच्चों, नेक   राय   दुष्टों   को  

कभी      नहीं     भाती     है

सच्चे  लोगों  की असमय  ही

जान     चली     जाती     है।

         


        वीरेन्द्र सिंह "ब्रजवासी"

            मुरादाबाद/उ.प्र.

            9719275453

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव की रचना टिक -टिक घोड़ा


टिक -टिक  घोड़ा, टिक -टिक घोड़ा।


 दिल्ली से  दौड़ा अल्मोड़ा।



अल्मोड़े से भरी उड़ान।


घूमा सारा हिंदुस्तान।



फिर भी थका नहीं ये घोड़ा।


लिया  पुणे से ईंधन थोड़ा।       



दौड़ गया फिर बादल पार।


अंतरिक्ष में पंख पसार।



लिये कई धरती के फेरे।


नदियाँ सागर पर्वत हेरे।



मिले राह में उड़न खटोले।


हाथ हिलाकर टाटा बोले।



घूम घाम कर वापस आया।


दिल्ली में फिर रंग जमाया।




प्रभुदयाल श्रीवास्तव