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गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

शरद कुमार श्रीवास्तव की रचना : प्रिन्सेज डॉल,  फूल और प्यारी तितली :



प्रिन्सेज डॉल,  फूल और प्यारी तितली

बसंत  का मौसम  था ।   प्रिन्सेज के  बगीचे मे खूब सुन्दर प्यारे प्यारे  फूल खिले हुये थे ।  डाॅल,  स्कूल  जाने से पहले  अपने  बगीचे में  जरूर  जाती थी । फूलों  को हँसता  देख कर  उसको बहुत  अच्छा  लगता  था ।    उसे गुलाब बहुत पसंद  है ।  वह देखने  में  सुंदर  तो है ही उसकी खुश्बू भी   प्रिन्सेज डॉल को  बहुत  पसंद  है  ।  वैसे उसको दूसरे  फूल  भी पसन्द  हैं ।  डाहलिया, गुलदावदी , पैन्जी,  पाॅपी आदि  फूल तो जाड़े के  फूल हैं  जो  प्रिन्सेज डॉल को  पसन्द  है ।    बेले के  फूल तो गर्मियों मे आते हैं   जिसकी  मोहक खुश्बू और सफेद प्यारा  रंग  भी  उसे पसंद  है  ।   परन्तु  गुलाब  के  फूल की  बात   ही  कुछ  और  है  ।   हर  मौसम  में गुलाब  हँसते खिलखिलाते बहुत  प्यारे   नजर आते हैं ।



उस दिन प्रिन्सेज को  बगीचे  में   प्यारी सी  तितलियाँ  भी  दिखाई  दीं  ।    प्रिन्सेज  को  बड़ा  मज़ा  आ गया  ।  वह एक  तितली  के  पीछे  दौड़ी जो  गुलाब  के  फूल  के  ऊपर बैठी थी और  उससे बातें  कर  रही  थी  ।   प्रिन्सेज डॉल को आता देख  कर  वह झट से  उड़ गई । डाॅल उसके  पीछे दौड़  रही थी लेकिन  उसको वह पकड़  नहीं  पा रही  थी ।    इतने मे पीछे  से  किसी  ने आवाज़  लगाई   तो उसने देखा  कि  गुलाब के  फूल  से  से आवाज  आ रही थी ।     गुलाब के  फूल  की  उदासी भी साफ दिखाई  दे  रही  थी  ।     उसकी  दो  चार  पंखुड़ियाँ  झड़ गई  थी   और  गुलाब  का फूल  उससे  कह रहा था कि   काफी दिनों  के  बाद  उसकी  तितली  बहन उसके पास  आई थी और तुम  ने उसे उड़ा दिया ।   उसी  समय  डॉल के  कान के  पास  ही  तितली  निकली ।   वह भी  कह रही थी  कि  मै   इतने दिनों  के  बाद अपनी बहन  से मिलने  आई थी  और तुम मुझे  पकड़ने के  लिये  दौड़  पडीं  यह तो अच्छी  बात नही  है  ।   प्रिन्सेज डॉल बोली  मैं  क्या  करूँ  मुझे  तितलियाँ  बहुत  पसंद  हैं  ।   इस पर तितली  बोली लेकिन  पकडने से तो मेरे पंख टूट जायेगें  और मै मर जाऊँगी ।   प्रकृति ने सुन्दर  चीजें  बनाई है सिर्फ  देखने के  लिए  उन्हें  तोड कर बर्बाद  करने  के  लिए  नहीं  ।   प्रिन्सेज को याद  आया कि  जब जादूगर  👺 ने उसे  पकड़  लिया  था तब उसे कितना बुरा लगा  था और वह अपनी मम्मी  के  लिए  कितना  रोई थी ।  उसने तुरन्त  उसे तितली  से माफी  मांगी और कहा कि  तुम हमेशा इसी तरह फूलों  से  मिलने  आया  करना ।   हम बच्चे तुम्हें  विश्वास  दिलाते हैं  कि  हम सिर्फ  तुम्हें  देखेंगे  और तुमको पडेगा नहीं ।   इतने में  स्कूल  की वैन का हार्न बजा और प्रिन्सेज डॉल स्कूल  चली गई ।

                                शरद कुमार  श्रीवास्तव 




शरद कुमार श्रीवास्तव की रचना : हंस और मूर्ख कछुआ




हंस और मूर्ख कछुआ

 (पंचतंत्र की कथाओं पर आधारित)

एक सरोवर पर  रहता था एक हंस का जोड़ा
रहता वहीं एक कछुवाा भी था बातूनी  थोड़ा
पड़ा अकाल भयंकर भैय्या सूखे ताल तलैया
कछुआ बोला हसों से छोड़ें सरोवर हम भैया

हंस बोले हम उड़ जाये पर तुम कैसे जाओगे
सूखे ताल मे बिना दाना पानी के मर जाओगे
भले हंस थे सूखे ताल मे कछुआ छोड़ न पाये
भाग दौड़कर जुगत लगानेे लकड़ी खोज लाये

दोनो हसों ने अपनी चोंच से पकड़ी थी लकड़ी
कहा कछुए को जोर से बीच मे पकडो लकड़ी
बात न करना तबतक मन्जिल जबतक न आए
समझदार तुम हो अब दादा तुम्हे कौन समझाऐ.

बीच राह मे कुछ बालकों ने की हसों की बड़ाई
कितना चतुर हंस का जोड़ा खूब जुगत लगाई
कछुआ लगा उनको यह अपनी चुगत बताने
जैसे ही मुँह खोला उसने गिरा वह चारों खाने



                                   शरद  कुमार  श्रीवास्तव 

महेन्द्र देवांगन माटी  की रचना : दोहे







दोहा


तन मन दोनों चंगा हो, रोग न ब्यापे कोय ।

सरल सहज हो काम भी, मिले सफलता तोय ।।


काम करो सब प्रेम से, कटू न मन में आय ।

होत तुरंत ही काज सब, मन में खुशियाँ छाय ।।


शीतल मंद समीर चले, तन को देत कंपाय ।

पूष महिना जाड़ा की , बाहर धूप सुहाय ।।


कोयल कूकत बाग में, सबके मन को भाय ।

कलियन देखी फूल को, तितली भी मुसकाय ।।


                        महेन्द्र देवांगन माटी 

                         पंडरिया छत्तीसगढ़ 

भुवन बिष्ट की रचना : अ से अनार




अ से अनार,...
आओ बांटें जग में प्यार,
आ से आम,... 
सदा करें हम अच्छे काम,
इ से इमली,...
देश की राजधानी है दिल्ली,
ई से ईख...
सदा आदर्शो पर चलना सिख,
उ से उल्लू...
सच्चाई को कभी न भूल,
ऊ से ऊन....
अच्छाई की ताकत बुन,
ऋ से ऋषि,...
सुंदर खेत खलिहान है कृषि,
ए से एड़ी...
जीवन है संघर्ष की सीढ़ी,
ऐ से ऐनक...
मेहनत है सफलता की जनक,
ओ से ओखली...
झूठ की राह होती है खोखली,
औ से औरत....
मेहनत से मिलती है महारथ,
अं से अंगूर....
पढ़ना लिखना सभी जरूर,
अः है खाली....
सजायें मानवता की थाली,
बच्चों बजाओ मिलकर ताली


                             ........भुवन बिष्ट
                              रानीखेत (अल्मोड़ा)
                              उत्तराखण्ड

सुशील शर्मा की रचना; मेरा देश मेरी पहचान (त्रिशब्दीय रचना)





मेरा देश मेरी पहचान
(त्रिशब्दीय रचना)

नव स्वतंत्र गान।
स्वच्छ शास्त्रीय परिधान।


 दैवीय संस्कृति संपन्न।
विविध प्राकृतिक रंग।

विभिन्न धार्मिक उत्सव।
राष्ट्रीयता के महोत्सव।

संस्कृति की विविधता।
अविच्छिन्न धार्मिक समरसता।

कन्याकुमारी से कश्मीर।
अरुणांचल से कच्छतीर।

होली की हुड़दंग।
   ईद की तरंग।

दीपावली के दीप।
श्रद्धा समन्वय समीप।

हिन्दसागर का तीर।
हिमालय धीर गंभीर।

शादी ढोल तमाशे।
गोल बर्फ बताशे।

हिन्दू सिख ईसाई।
पारसी मुस्लिम भाई।

प्रगति के सोपान।
अंतरिक्ष में मंगलयान।

सुरक्षा स्वास्थ्य शिक्षा।
नारियों की अभिरक्षा।

समता ममता युक्त।
द्वेष पाखंड विमुक्त।

आगे बढ़ता देश।
उन्नत सब प्रदेश।

सबका हो विकास।
करें सम्मलित प्रयास।

भारत भाग्य विधान।
भारत मेरी पहचान।

                              सुशील  शर्मा 

मधु त्यागी की रचना : तितली रानी




तितली रानी


रंग-बिरंगे पंखों वाली,

तितली रानी, बड़ी सयानी।

फूल-फूल पर मॅंडराती,

फूलों के रंग, पंखों में भर,

बच्चों को बहलाती हो।



सतरंगी पंखों के संग,

इठलाती, इतराती हो।

फूलों का रस पीकर,

चुपके से उड़ जाती हो।


फूल फूल पर, कली कली पर,

गुन -गुन, गुन-गुन गाती हो।

नीले,पीले,लाल, बैंगनी

सुंदर पंखों वाली तुम,

जब हम तुम्हे पकड़ना चाहे,

दूर कहीं उड़ जाती हो।




                             मधु त्यागी
                            ओ- 458 , जलवायु विहार
                            सैक्टर- 30 गुरूग्राम हरियाणा ।






अंजू निगम की बालकथा: मास्टर  जी




मास्टर  जी
गोपी अपने माँ-बापू और चार बहनो के साथ गाँव के एक छोटे से झोपड़े में रहता था| झोपड़ी की छत धान के सूखे पुए से बनी थी| जो बरसाती दिनो में एक भी सूखी जगह न बचा पाती|
    इस साल खुब बरसात हुई| गोपी के बापू की दिहाड़ी भी जाती रही| खाने के लाले पड़ गये|
    उन्हीं दिनो गोपी के ताऊजी गाँव आये थे| अपने भाई की हालत पर तरस खा वे गोपी और उसकी बहन को अपने साथ लिवा ले गये|गोपी के बापू को भी कुछ पैसे पकड़ा दिये|
  ताऊजी का गाँव बड़ा था|ताऊजी गाँव के पास बन रही सड़क का काम देखते थे| गोपी का काम ताऊजी का छोटा-मोटा काम करना और ताऊजी के लिये घर से दोपहर का खाना लाना होता था|
  एक दिन जब गोपी खाना लेने आयी तो पास के स्कुल से बच्चो के समवेत स्वर में गिनती दोहराई जा रही थी| गोपी के पैर स्कुल के गेट पर रुक गये|              मास्टरजी ने आज बाहर ही कक्षा लगा रखी थी| काले बोर्ड पर लिखी गुलाबी, नीली चॉक से लिखी गिनती गोपी को खुब भायी|
    अब तो गोपी रोज आकर स्कुल के गेट पर रुकने लगा| बोर्ड पर लिखे अक्षरो या गिनती को सीखने की कोशिश करता| पर उसे लिखता कहाँ? उसके पास न तो चॉक थी न स्लेट|
  उसे एक तरकीब सुझी| उसने अपनी उगंली से वहाँ पड़ी मिट्टी पर ही लिखना शुरु कर दिया| दूसरे दिन फिर देखता कि उसने सही लिखा या नहीं?
     हफ्ते भर ये चला| फिर मास्टरजी कक्षा अंदर लगाने लगे| गोपी उदास हो गया| मगर पढ़ने की उसकी इच्छा जब बहुत बढ़ गयी तब एक दिन वो सबकी नजरे बचा कक्षा से सट कर खड़ा हो गया| पर डर तो था न कि कोई उसे वहाँ खड़ा देख न ले| यहाँ जब वो मिट्टी में न लिख पाया तो उसने बच्चो के सुर में सुर मिलाना शुरु कर दिया|
   एक दिन मास्टरजी ने उसे पकड़ ही लिया|गोपीबहुत घबरा गया| पर मास्टरजी नेक इंसान थे| गोपी की पढ़ाई में लगन को उन्होने परख लिया था|मास्टरजी ने उसे कक्षा में आकर बैठने की भी इजाजत दे दी| नयी स्लेट और चॉक भी दी| गोपी बहुत खुश हुआ|
     ताऊजी से मिल कर मास्टरजी ने गोपी को पढ़ा लेने की बात कही| ये भी यकीन दिलाया कि इसमें न ताऊजी को कोई खर्चा करना पड़ेगा और न ही काम का कोई हर्जा होगा|
    ताऊजी भी ये सोच कर की गोपी के पढ़ लेने से उन्हें भी हिसाब-किताब रखने
में सुविधा होगी, मान गये|
मास्टरजी की वजह से एक बच्चे का जीवन संवर गया|

                                अंजू निगम

 गोबिंदरूप सिंह आनंद की रचना : भगवान भी हैरान




भगवान भी हैरान

अपने तजुर्बे से इंसान ने कर दी खोज महान,

            जिसने कर दिए बड़े काम आसान,

              उसे कहते हैं विज्ञान।

          पर एक चीज़ वो कभी ना बना पाया,

             उसे कहते हैं भगवान।

            उस भगवान ने दी ज़मीन,

          जिसे जोत किसान बनाए खलिहान

                और दिए घने जंगल,

         जिसे काटकर इंसान ने बनाए अपने मकान।

          जिसने कर दिया प्रकृति को भी परेशान ।

               मतलबी बनता गया इंसान।

          जिसे देखकर भगवान भी हो गया हैरान।

          जिसे देखकर भगवान भी हो गया परेशान।।



                               - गोबिंदरूप सिंह आनंद

                                  कक्षा छह सी

                                   सत्र 2016-17

                                  एमिटी इंटरनेशनल स्कूल

                                   सैक्टर - 46, गुड़गाॅंव


रविवार, 26 मार्च 2017

मधु त्यागी की रचना : सच और झूठ




सच और झूठ


जब भी बोलो , सच ही बोलो,

झूठ कभी ना बोलो।

सच की होती जीत हमेषा,

झूठ सदा ही हारे।


सच्चे बच्चे लगते अच्छे,

प्यार सभी का पाते।

झूठे बच्चों से तो,

हर कोई दूर है भागे।


सच के आगे झुकते हैं सब,

झूठ कोई ना माने।

सच का ग्राहक है सारा जग,

झूठ कोई ना चाहे।


सच की नींव है जितनी पक्की,

झूठ की उतनी कच्ची।

इसीलिए -

जब भी बोलो, सच ही बोलो,

झूठ कभी ना बोलो।


             
                              मधु त्यागी
                              ओ- 458
                              जलवायु विहार
                             सैक्टर- 30
                              गुरुग्राम


गुंजिका कौशिक कक्षा नौ एमिटी स्कूल गुरूग्राम की रचना : एक नई पहल





एक नई पहल


            हमारे घर की सुबह बहुत शांतिप्रिय और सुंदर होती है। गैस पर खाना पकाती हुई मेरी माॅं बहुत प्रसन्न होती है, परंतु हमारे घर के सामने रहने वाले उस परिवार के सदस्यों का व उस माॅं का क्या ? जो उस  लकड़ियों के  चूल्हे  पर रोज़ सुबह खाना बनाती है। हमारे घर के पास,, ।   एक छोटी सी झोंपड़ी में पाॅंच लोगों का परिवार रहता है, उस परिवार में मेरी ही उम्र की साॅंवली नाम की एक लड़की भी रहती है। वह मेरी अच्छी दोस्त बन गई है, उसी ने बताया कि उनके पास इतने पैसे नहीं कि वह सिलेंडर खरीद सकें इसलिए उसकी माॅं चूल्हे पर ही खाना बनाती है। साॅंवली और उसकी माॅं दोनो मिलकर चूल्हे पर खाना बनाती हैं परंतु उन्हें यह ज्ञात नहीं कि इसके बहुत से नुकसान हैं। चूल्हे पर बनने वाला खाना तो शुद्ध व स्वास्थ्यवर्धक होता है परंतु इसे बनाने वाले का स्वास्थ्य संकट में आ जाता है। लकड़ी के चूल्हे से निकलने वाला धुआँ , हानिकारक रसायन, अस्थमा, ट्यूबरोक्लोसिस जैसी बीमारियों को जन्म देता है । उन्हें ज्ञात ही नहीं कि वे अपने घर की आग में स्वयं जल रहे है। चूल्हा जलाने के लिए वे लकड़ियाॅं काटते हैं जिससे हमारे पर्यावरण को भी नुकसान होता है। मुझे लगा कि मुझे उस परिवार को इस आग से बचाना चाहिए और पर्यावरण को बचाने में भी अपना सहयोग देना चाहिए इसलिए मैंने उन्हें हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा चलाई गई ˝उज्ज्वला योजना˝ के बारे में बताया। उज्ज्वला योजना के बारे में सुनकर उस परिवार को बहुत खुशी हुई, उन्होंने अपने परिवार की सुख शांति और अच्छे स्वास्थ्य के लिए लकड़ी का चूल्हा जलाना छोड़ा और उज्ज्वला योजना के अंतर्गत गैस का सिलेंडर प्राप्त किया। अब मेरी दोस्त साॅंवली और उसका परिवार साथ ही हमारा पर्याावरण भी सुरक्षित है।



                            गुंजिका कौशिक
                            कक्षा - नौ (ब)
                             एमिटी इंटरनेशनल स्कूल
                             सैक्टर-46, गुड़गाॅंव